चंडीगढ़: गरीबों के मसीहा लंगर बाबा के परिवार को पद्मश्री पुरस्कार सौंपा, वर्ष 2020 में हुई थी घोषणा
लंगर बाबा को लोगों को भोजन करवाने की प्रेरणा उनकी दादी माई गुलाबी से मिली थी, जो गरीबों के लिए अपने शहर पेशावर (पाकिस्तान) में लंगर लगाया करती थीं। लंगर सेवा में बाबा की पत्नी निर्मल भी पूरा सहयोग कर रहीं थीं। लंगर बाबा लोगों को सात्विक भोजन देते थे। हलवा और फल के अलावा दाल, चावल, सब्जी व रोटी भी लंगर में वितरित करते थे। लंबी बीमारी के बाद 29 नवंबर 2021 को लंगर बाबा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
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लंगर बाबा के नाम से प्रसिद्ध स्व. जगदीश आहूजा की पत्नी निर्मल आहूजा और उनके परिजनों को यूटी प्रशासक के सलाहकार धर्मपाल ने मंगलवार को पद्मश्री पुरस्कार सौंपा। लंगर बाबा को वर्ष 2020 में पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा की गई थी, लेकिन लंबे समय से बीमार होने के चलते वह राष्ट्रपति के हाथों यह सम्मान लेने के लिए उपस्थित नहीं हो सके। बाद में उनकी मृत्यु हो गई। धर्मपाल ने परिजनों को पुरस्कार सौंपते हुए लंगर बाबा के कार्यों को याद किया। बता दें कि लंगर बाबा सेक्टर-23 में रहते थे।
जगदीश आहूजा पीजीआई चंडीगढ़ के बाहर 40 वर्षों से रोजाना लंगर लगाकर लोगों की सेवा कर रहे थे। उन्होंने जीएमएसएच-16 और जीएमसीएच-32 के सामने भी लंगर लगाकर लोगों का पेट भरा। इस दौरान उन्हें कई बार विषम परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ा।
लोगों का पेट भरने के लिए उन्होंने अपनी करोड़ों रुपये की संपत्तियां तक बेच दीं, लेकिन लंगर सेवा को कभी रुकने नहीं दिया। ऐसा माना जाता था कि जब तक बाबा जिंदा हैं, तब तक पीजीआई का कोई मरीज रात में भूखा नहीं सो सकता। हर रोज 500 से 600 व्यक्तियों को वह लंगर खिलाते थे। यही नहीं लंगर के दौरान आने वाले बच्चों को बिस्कुट और खिलौने भी बांटते थे। उनकी सेवा को देखते हुए सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया।
21 साल की उम्र में आए थे चंडीगढ़
परिवार के सदस्य बताते हैं कि लंगर बाबा 1947 में पेशावर से विस्थापित होकर मानसा (पंजाब) आ गए थे। उस समय उनकी उम्र करीब 12 वर्ष थी। इतनी कम उम्र से ही उनका जीवन संघर्ष शुरू हो गया था।परिवार विस्थापन के दौरान गुजर गया था। ऐसे में जिंदा रहने के लिए उन्हें रेलवे स्टेशन पर नमकीन दाल बेचनी पड़ी। कई बार तो बिक्री न होने पर उन्हें भूखे पेट ही सोना पड़ता था।
मानसा से वह पटियाला आ गए और गुड़ और फल बेचकर जीवनयापन शुरू किया। यहां से 1956 में लगभग 21 साल की उम्र में चंडीगढ़ आए। उस समय चंडीगढ़ को देश का पहला योजनाबद्ध शहर बनाया जा रहा था। यहां उन्होंने एक फल की रेहड़ी किराए पर लेकर केले बेचना शुरू किया। काम चल निकला और ठीकठाक कमाई होने लगी। इसके बाद वर्ष 1981 में चंडीगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में उन्होंने लंगर लगाना शुरू किया।