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Chandigarh: मतदान के लिए बचा सिर्फ एक हफ्ता... चंडीगढ़ पर अब तक नहीं चढ़ा चुनावी रंग
Fri, 24 May 2024 06:57 PM IST
निवेदिता वर्मा
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Fri, 24 May 2024 06:57 PM IST
सार
चंडीगढ़ में इस बार भाजपा की तरफ से संजय टंडन मैदान में हैं। वहीं कांग्रेस ने मनीष तिवारी पर दांव लगाया है। चंडीगढ़ में अंतिम चरण में एक जून को मतदान होगा।
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संजय टंडन और मनीष तिवारी।
- फोटो : फाइल
विस्तार
लोकसभा चुनाव के लिए होने वाले मतदान में महज एक हफ्ते का समय रह गया है, लेकिन चंडीगढ़ अब भी चुनावी रंग में नजर नहीं आ रहा है। न जनता में जोश नजर आ रहा है, न चुनावी सरगर्मियां जोर पकड़ रही हैं। इससे राजनीतिक पार्टियों के साथ चुनाव विभाग के अधिकारी भी चिंतित हैं। सभी जनता का मूड भांपने में लगे हुए हैं।
शहरी क्षेत्रों में कहीं भी चुनावी माहौल नजर नहीं आ रहा। हालांकि गांव-कॉलोनियों में जरूर चुनावी शोर सुनाई देने लगा है। गांवों के चौक-चौराहों पर चुनावी महफिलें सज रही हैं। इस बार किसका माहौल है, किसका पलड़ा भारी नजर आ रहा है, जैसी चर्चाएं जोश-शोर से चल रही हैं। शहर में चुनावी शोर कम होने के पीछे जानकारी कई कारण बता रहे हैं। पहला, मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अभी तक साइलेंट हैं। उनका झुकाव किस तरफ है, वो अभी तक स्पष्ट नहीं है। दूसरा, चुनाव आयोग इस बार काफी सख्त है। बिना मंजूरी शहर में कहीं भी झंडा, पोस्टर-बैनर आदि लगाने पर कार्रवाई की जा रही है। खर्च उम्मीदवारों के खाते में जोड़ दिया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार राजनीतिक पार्टियों ने ऑटो के पीछे लगाने के लिए कई पोस्टर, चाय वालों को देने के लिए छतरी बनाए हुए थे लेकिन जैसे ही चुनाव आयोग को इसकी की जानकारी मिली, इन सब पर रोक लगा दिया गया। उम्मीदवारों के सभी छोटे-बड़े कार्यक्रम पर चुनाव आयोग के फ्लाइंग स्क्वायड की नजर है। कार्यक्रमों की वीडियोग्राफी की जा रही है। इसलिए उम्मीदवार भी फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।
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भीषण गर्मी ने भी प्रचार की रफ्तार की धीमी
पिछले आठ दिनों से शहर का अधिकतम तापमान 40 डिग्री से ज्यादा दर्ज किया जा रहा है। पिछले दिनों पारा 45 डिग्री के करीब पहुंच गया था। आने वाले दिनों में भी चंडीगढ़ मौसम केंद्र ने भीषण गर्मी की चेतावनी जारी की है। इस गर्मी की वजह से भी चुनाव प्रचार की रफ्तार थोड़ी धीमी हो गई है। नेता सुबह 6:00 बजे से अपना चुनाव प्रचार शुरू कर रहे हैं, लेकिन सूरज के चढ़ने के साथ रफ्तार कम हो जाती है। दोपहर के समय में नेता पद यात्राओं से बच रहे हैं और फिर यह पद यात्राएं दोबारा शाम 5:00 बजे से शुरू हो जाती हैं। दोपहर के समय में इनडोर बैठकें हो रही हैं।
2019 के चुनाव में चढ़ गया था रंग
2019 का चुनाव इस चुनाव से बिल्कुल अलग था। चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले ही सियासी मैदान किरण खेर के 5 साल के कार्य और पवन बंसल की तरफ से दिए गए बदलाव के नारे का रूप ले चुका था। किरण खेर पांच साल में किए कार्यों को दोहरा रही थीं और डबल इंजन की सरकार के दावे किए जा रहे थे तो पवन बंसल डड्डूमाजरा के डंपिंग ग्राउंड की विफलता और बदलाव के नारे पर जोर दे रहे थे। दोनों के बीच जुबानी जंग तेज थी। हरमोहन धवन भी मैदान में थे और वो भी केंद्रीय मंत्री रहते अपने कार्यों को जनता तक पहुंचा रहे थे। राष्ट्रीय मुद्दे भी हावी थे। कांग्रेस राफेल सौदे में भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर चौकीदार चोर है के नारे लगवा रहे थे तो भाजपा पाकिस्तान के खिलाफ हुई एयर स्ट्राइक को मोदी है तो मुमकिन है, नारा लगा रही थी।
भाजपा-कांग्रेस ने बदली रणनीति
भाजपा ने इस चुनाव में उन बूथों के लिए विशेष रणनीति तैयार की है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी पीछे रही थी। उन क्षेत्रों में से ही कार्यकर्ता ढूंढे गए हैं और उन्हें मतदाताओं से व्यक्तिगत रूप से मिलकर पार्टी की विचारधारा उन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी है। इसके लिए मतदाता सूची को अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है। वहीं, कांग्रेस ने भी रणनीति बदली है और गांव-कालोनियों पर फोकस किया है। स्मॉल फ्लैट्स और लाल डोरे की बाहर की आबादी वाले इलाकों पर कांग्रेस की सबसे ज्यादा नजर है। कांग्रेस के नेता अपने भाषण में भाजपा की विफलता को दोहरा रहे हैं और हालात को सुधारने के दावे कर रहे हैं।
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शहरी क्षेत्रों में कहीं भी चुनावी माहौल नजर नहीं आ रहा। हालांकि गांव-कॉलोनियों में जरूर चुनावी शोर सुनाई देने लगा है। गांवों के चौक-चौराहों पर चुनावी महफिलें सज रही हैं। इस बार किसका माहौल है, किसका पलड़ा भारी नजर आ रहा है, जैसी चर्चाएं जोश-शोर से चल रही हैं। शहर में चुनावी शोर कम होने के पीछे जानकारी कई कारण बता रहे हैं। पहला, मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अभी तक साइलेंट हैं। उनका झुकाव किस तरफ है, वो अभी तक स्पष्ट नहीं है। दूसरा, चुनाव आयोग इस बार काफी सख्त है। बिना मंजूरी शहर में कहीं भी झंडा, पोस्टर-बैनर आदि लगाने पर कार्रवाई की जा रही है। खर्च उम्मीदवारों के खाते में जोड़ दिया जा रहा है।
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जानकारी के अनुसार राजनीतिक पार्टियों ने ऑटो के पीछे लगाने के लिए कई पोस्टर, चाय वालों को देने के लिए छतरी बनाए हुए थे लेकिन जैसे ही चुनाव आयोग को इसकी की जानकारी मिली, इन सब पर रोक लगा दिया गया। उम्मीदवारों के सभी छोटे-बड़े कार्यक्रम पर चुनाव आयोग के फ्लाइंग स्क्वायड की नजर है। कार्यक्रमों की वीडियोग्राफी की जा रही है। इसलिए उम्मीदवार भी फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।
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भीषण गर्मी ने भी प्रचार की रफ्तार की धीमी
पिछले आठ दिनों से शहर का अधिकतम तापमान 40 डिग्री से ज्यादा दर्ज किया जा रहा है। पिछले दिनों पारा 45 डिग्री के करीब पहुंच गया था। आने वाले दिनों में भी चंडीगढ़ मौसम केंद्र ने भीषण गर्मी की चेतावनी जारी की है। इस गर्मी की वजह से भी चुनाव प्रचार की रफ्तार थोड़ी धीमी हो गई है। नेता सुबह 6:00 बजे से अपना चुनाव प्रचार शुरू कर रहे हैं, लेकिन सूरज के चढ़ने के साथ रफ्तार कम हो जाती है। दोपहर के समय में नेता पद यात्राओं से बच रहे हैं और फिर यह पद यात्राएं दोबारा शाम 5:00 बजे से शुरू हो जाती हैं। दोपहर के समय में इनडोर बैठकें हो रही हैं।
2019 के चुनाव में चढ़ गया था रंग
2019 का चुनाव इस चुनाव से बिल्कुल अलग था। चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले ही सियासी मैदान किरण खेर के 5 साल के कार्य और पवन बंसल की तरफ से दिए गए बदलाव के नारे का रूप ले चुका था। किरण खेर पांच साल में किए कार्यों को दोहरा रही थीं और डबल इंजन की सरकार के दावे किए जा रहे थे तो पवन बंसल डड्डूमाजरा के डंपिंग ग्राउंड की विफलता और बदलाव के नारे पर जोर दे रहे थे। दोनों के बीच जुबानी जंग तेज थी। हरमोहन धवन भी मैदान में थे और वो भी केंद्रीय मंत्री रहते अपने कार्यों को जनता तक पहुंचा रहे थे। राष्ट्रीय मुद्दे भी हावी थे। कांग्रेस राफेल सौदे में भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर चौकीदार चोर है के नारे लगवा रहे थे तो भाजपा पाकिस्तान के खिलाफ हुई एयर स्ट्राइक को मोदी है तो मुमकिन है, नारा लगा रही थी।
भाजपा-कांग्रेस ने बदली रणनीति
भाजपा ने इस चुनाव में उन बूथों के लिए विशेष रणनीति तैयार की है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी पीछे रही थी। उन क्षेत्रों में से ही कार्यकर्ता ढूंढे गए हैं और उन्हें मतदाताओं से व्यक्तिगत रूप से मिलकर पार्टी की विचारधारा उन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी है। इसके लिए मतदाता सूची को अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है। वहीं, कांग्रेस ने भी रणनीति बदली है और गांव-कालोनियों पर फोकस किया है। स्मॉल फ्लैट्स और लाल डोरे की बाहर की आबादी वाले इलाकों पर कांग्रेस की सबसे ज्यादा नजर है। कांग्रेस के नेता अपने भाषण में भाजपा की विफलता को दोहरा रहे हैं और हालात को सुधारने के दावे कर रहे हैं।