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लिटरेचर फेस्टिवल का तीसरा दिन: नारी सशक्तिकरण के महत्व पर हुई चर्चा

Sun, 13 Nov 2016 01:03 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 13 Nov 2016 01:03 AM IST
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Chandigarh Literature Festival third day in chandigarh club
लिटरेचर फेस्टिवल का तीसरा दिन
अदब फाउंडेशन द्वारा आयोजित चंडीगढ़ लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन की शुरुआत ‘कांक्वेस्ट एंड कम्यूनिटी’ किताब पर चर्चा से हुई। जिसमें किताब के लेखक शाहिद अमीन से आलोचक आलोक राय ने बात की। उसके बाद ‘दि ग्लास बीड कर्टेन’ की लेखक लक्ष्मी कन्नन से समीक्षक मंजू जैदका ने बात की। किताब की कहानी पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि इस किताब की नायिका कल्याणी जब अपने ससुराल पहुंचती है तो महिलाएं उसका मजाक उड़ाती हैं, क्योंकि उसकी हाइट पति से ज्यादा होती है। किताब कहीं-कहीं आत्मकथात्मक शैली में लिखी प्रतीत होती है, परंतु यह है एक कहानी। सेशन में किताब के हिस्से पढ़कर सुनाए गए जिनसे पता चला कि एक महिला को सही साबित होने के लिए कितने किस्म के सामाजिक दबावों को झेलना पड़ता है।
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 लेखक महेश राव ने अपनी किताब ‘वन पॉइंट टू बिलियन’ पर बात की। इस मौके पर उन्होंने कहा कि  ‘भारत में कहानियां खुद ब खुद आपके पास चलकर आती हैं। अच्छे प्लॉट होने के बावजूद उन्होंने कहानियों को उपन्यास में तब्दील नहीं किया क्योंकि उनको लंबा खींचने का मतलब होता कि कहानी के अर्थ की समाप्ति।  दूसरे, एक कहानी को महीने भर में पूरा किया जा सकता है, जबकि उपन्यास लिखने में कई वर्ष भी कम पड़ सकते हैं।
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 निर्माता शूजीत सरकार, निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी और पटकथा लेखक रितेश शाह ने अपनी फिल्म ‘पीकू’ के बारे में समीक्षक मीना अय्यर के साथ विस्तार से चर्चा की। इस मौके पर  शूजीत सरकार ने कहा कि आज भी महिला और पुरुष में भेदभाव किया जाता है।  पटकथा लेखक रितेश शाह का कहना था कि फिल्म के डायलॉग भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाले हैं, वे सिर्फ लच्छेदार शब्द या वाक्य नहीं हैं। सेशन में निर्भया मामले का जिक्र आया। बात हुई कि अदालतें कितनी बेरहमी से डील करती हैं। पूरे मामले को और शायद इसी शर्म के चलते बहुत सी पीड़ित महिलाएं अपने साथ हुई ज्यादतियों की सूचना पुलिस में दर्ज नहीं करातीं। तीनों का मानना था कि उनकी फिल्म के किरदारों की हकीकत से ही फिल्म कामयाब रही। दर्शकों ने कहानी से खुद को जुड़ा हुआ महसूस किया।
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