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जज्बे को सलामः बोल नहीं सकता, फिर भी विदेशी सरजमीं पर देश को दिलाया गोल्ड

Mon, 03 Apr 2017 09:12 AM IST
संजीव पंगोत्रा/अमर उजाला, चंडीगढ़
संजीव पंगोत्रा/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Mon, 03 Apr 2017 09:12 AM IST
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chandigarh hockey player shivam kumar wins gold in austria, not able to speak
हॉकी प्लेयर शिवम कुमार
चंडीगढ़ का हॉकी प्लेयर शिवम कुमार बोल नहीं सकता, लेकिन कुछ कर गुजरने का जज्बा इतना कि विदेशी सरजमीं पर देश का परचम लहरा आया। शिवम कुमार ने आस्ट्रिया में आयोजित विंटर वर्ल्ड गेम्स में फ्लोर हॉकी में भारत को गोल्ड मेडल जीतने में अहम भूमिका निभाई। यह गेम्स पिछले महीने के आखिरी सप्ताह में खेली गई। इसमें भारत की स्पेशल टीम ने फाइनल में लिथुआनिया को 7-2 से हराकर गोल्ड मेडल जीता।
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इससे पहले सेमीफाइनल में भारत ने स्वीडन 6-4 से शिकस्त दी थी। आस्ट्रिया में आयोजित विंटर वर्ल्ड गेम्स के फ्लोर हॉकी में गोल्ड जीतने वाली भारतीय टीम में सिटी सेशिवम कुमार एकमात्र खिलाड़ी हैं। शिवम चंडीमंदिर के आशा स्कूल के छात्र हैं और चंडीगढ़ स्थित भवन विद्यालय में कोच अनिल के ट्रेनी हैं। वर्ल्ड कप में जाने से पहले अनिल कुमार की अगुवाई में शिवम को तैयार किया गया था।
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ऐसे हुआ था चयन
देश में स्पेशल खिलाड़ियों के लिए हुई नेशनल गेम्स में शानदार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों के लिए हिमाचल प्रदेश के कसौली में विशेष कैंप लगाया गया था। इसमें देश भर से नेशनल गेम्स में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को आमंत्रित किया गया था। यहां पर कड़ी ट्रेनिंग के बाद शिवम का भारतीय टीम में चयन हुआ था।
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मां बाप की आंख का तारा

chandigarh hockey player shivam kumar wins gold in austria, not able to speak
Hockey India - फोटो : PTI
भारत को गोल्ड दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले शिवम के माता-पिता गर्व से फूले नही समा रहे हैं। पिता वकील कुमार गुप्ता पेशे से चंडीमंदिर में हवलदार हैं और मां मंजू देवी गृहणी हैं। पिता ने बताया कि उनके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा राजेश ग्रेजुएशन कर रहा है।

वहीं, शिवम शुरू से ही मानसिक तौर पर कमजोर है। उसे बोलने में दिक्कत होती है। जब से खेलों की और रुख किया है, उसमें आत्मविश्वास बढ़ने लगा हैं। मां मंजू ने कहा कि भले ही हमारा बेटा स्पेशल कैटेगेरी में है, लेकिन आज उसने हमारा सर गर्व से ऊंचा कर दिया है। वहीं, शिवम ने अधिक कुछ तो नहीं कहा, लेकिन समझा दिया कि स्वर्ण जीतने से खुश हूं और मैं हॉकी खेलना जारी रखूंगा।

इनके जैसे बनना पड़ता है
कोच अनिल कुमार पिछले कई वर्ष से स्पेशल बच्चाें से जुड़े हुए हैैं। वह खासातौर पर इन बच्चाें को हॉकी की ट्रेनिंग देते हैं। अनिल ने बताया कि शुरू में इन्हें तैयार करने में काफी परेशानी आती है। लेकिन हम धैर्य नहीं खोते, इनके साथ इनकेजैसे ही बनना पड़ता है। कभी-कभी जो यह रूठ भी जाते है, लेकिन बजाय गुस्से होने के हम हमेशा हंसते हुए उनको ट्रेनिंग करवाते हैं। यह सब कठिन तो होता है, लेकिन जब गोल्ड मिलता है तो हमें लगता है कि हमारी मेहनत सफ ल हो गई। अनिल के अनुसार, भारत सरकार ने विजेता हॉकी टीम के हर सदस्य को पांच लाख रुपये देने की घोषणा की है।
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