चंडीगढ़ की जमीन का होगा एक्स-रे, 40 लाख की मशीन बताएगी अंदर का हाल
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चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी का भूगर्भ विज्ञान विभाग अब जमीन का एक्स-रे करेगा। इससे जमीन के अंदर की टूट फूट का आसानी से पता लग जाएगा। इसके लिए ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार खरीदा गया है। जिस पर 40 लाख रुपये का खर्च आया है। वैज्ञानिकों की मंशा है कि वह चंडीगढ़ की धरती का हाल जानें। इसके लिए वह प्रोजेक्ट तैयार कर केंद्र सरकार को भेजेंगे। वहां से मंजूरी मिलने के बाद काम शुरू किया जा सकेगा।
किरणों के जरिए ली जाएगी धरती के अंदर की फोटो
पीयू के भूगर्भ विज्ञान विभाग की अपनी एक साख है। यहां के भूगर्भ वैज्ञानिकों ने देश-दुनिया की पहाड़ियों पर रिसर्च कर यह पता लगाया है कि भूकंप का केंद्र कहां रहा है और कब आया था। अब यहां विद्यार्थियों को रिसर्च के जरिए यह सभी कार्य सिखाना होता है। इसलिए जरूरत थी कि ग्राउंड पेनिट्रिटिंग रडार की। लंबे प्रयास के बाद विभाग ने यह 40 लाख की कीमत से मशीन खरीदी है।
यह मशीन जमीन पर चलाई जाती है और इससे निकलने वाली किरणें पृथ्वी के नीचे जाती हैं और उसी से तस्वीर तैयार करती हैं। आने वाली तस्वीरों व डेटा का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं और जमीन का पूरा हाल बता देते हैं। यह किसी पिलर आदि का भी बेहतर ढंग से एक्स-रे करती है। यह दुनिया की प्रमुख मशीनों में शुमार है। इस मशीन का पहला प्रयोग यहां की टीम ने हरियाणा में किया है। हालांकि उसका परिणाम अभी सार्वजनिक नहीं किया है।
टीम अब चंडीगढ़ की जमीन का हाल जानने की तैयारी में है। हालांकि इसके लिए सरकार से अनुमति की जरूरत होगी। मालूम हो कि सरकार जहां भी बड़े प्रोजेक्ट शुरू करती है तो उससे पहले इस मशीन के जरिए वहां की जमीन का पता लगा लेती है कि जमीन में क्या-क्या चीजें दफन हैं।
इस तरह तैयार हुआ ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार
दुनियाभर में भूकंप आते हैं। इससे जनहानि व आर्थिक नुकसान होता है। भूकंप ने कई देशों के बड़े-बड़े शहर तबाह कर दिए हैं। उसके बाद जमीन के अंदर की स्थिति के बारे में पता लगाने का प्रयास शुरू हुआ। इसके लिए वैज्ञानिकों की टीम ने 12 फरवरी 1935 को इंग्लैंड के रॉबर्ट एलेक्जेंडर वाटसन की ओर से तैयार किए गए रडार की स्टडी की।
रेडियो तरंगों के जरिए किसी चीज की वस्तु स्थिति का पता लगाया जा सकता है, उसी तरह जमीन का भी पता लगाने के प्रोजेक्ट पर वैज्ञानिकों ने काम किया। 1929 में वैज्ञानिक डब्ल्यू स्टर्न ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार का उपयोग किया और ग्लेशियर की गहराई को मापा। 1970 के दशक तक इस क्षेत्र में और विकास हुए। 1972 में अपोलो-17 मिशन ने चंद्रमा के चारों ओर कक्षा में एल्स नामक एक ग्राउंड रडार बनाया। यह 1.3 किमी तक की गहराई तक की जानकारी कर लेता है।
विभाग की ओर से ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार खरीदी गई है। यह रडार जमीन का एक्स-रे करेगी। रिसर्च के लिए यह काफी काम आएगी। साथ ही सरकारी प्रोजेक्ट आदि के लिए भी काम लिया जा सकेगा। भविष्य में चंडीगढ़ की जमीन का हाल भी जानने की इच्छा है। इस पर काम करेंगे। - डॉ. महेश ठाकुर, भूगर्भ विज्ञान विभाग, पंजाब यूनिवर्सिटी