चंडीगढ़ में भी जश्न: नीरज चोपड़ा के इतिहास रचते ही डीएवी कॉलेज व ताऊ देवीलाल स्टेडियम में बजा ढोल, बंटीं मिठाइयां
नीरज चोपड़ा शुरू से ही जेवेलिन थ्रो में स्वर्ण पदक जीतने के प्रबल दावेदारों में से एक थे। फाइनल की तैयारियां भी उसी तरह से थीं। नीरज चोपड़ा ने जेवेलिन थ्रो सीखने की शुरुआत पंचकूला के ताऊ देवी लाल स्टेडियम से की थी।
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चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज सेक्टर- 10 के छात्र रहे नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक में जैसे ही इतिहास रचा, कॉलेज के साथ ही पंचकूला के ताऊ देवीलाल स्टेडियम में ढोल नगाड़े के साथ जश्न शुरू हो गया। कोई एक-दूसरे को गले लगा रहा था तो कोई तिरंगा लहराकर जीत की खुशी मना रहा था। क्या बच्चे और क्या बड़े सभी के लिए बस यह क्षण गर्व करने का था। इस मौके पर पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं यूटीसीए अध्यक्ष संजय टंडन और खिलाड़ी अंजुम मोदगिल भी डीएसी स्कूल में पहुंचे। दोनों ने शिक्षकों के साथ ढोल की थाप पर भंगड़ा किया।
नीरज चोपड़ा शुरू से ही जेवेलिन थ्रो में स्वर्ण पदक जीतने के प्रबल दावेदारों में से एक थे। फाइनल की तैयारियां भी उसी तरह से थीं। नीरज चोपड़ा ने जेवेलिन थ्रो सीखने की शुरुआत पंचकूला के ताऊ देवी लाल स्टेडियम से की थी। अपने खिलाड़ी का प्रदर्शन देखने के लिए वहां खासा इंतजाम किया था। फील्ड एंड ट्रैक के पास बड़ी सी स्क्रीन लगा रखी थी। ट्रैक के दोनों ओर हाथ में तिरंगा लेकर एथलीट बैठे हुए थे।
नीरज चोपड़ा के पूर्व कोच नदीम अहमद भी हाथों में तिरंगा लिए खिलाड़ियों के साथ लाइव मैच का प्रसारण देख रहे थे। जैसे ही नीरज ने अपने दूसरे मौके में 87.58 मीटर का थ्रो मारा, स्टेडियम तालियों से गूंज उठा। उसके बाद स्वर्ण पदक की घोषणा के साथ ही मिठाई बांटने का दौर शुरू हो गया। वहीं खिलाड़ियों ने डांस कर जश्न मनाया। डीएवी कॉलेज के प्रिंसिपल पवन शर्मा के साथ शिक्षकों और प्रोफेसर ने खुशी के इस मौके पर एक दूसरे को मिठाई खिलाई।
स्वर्ण की घोषणा होते ही निकल आए आंसू
ताऊ देवीलाल स्टेडियम में नीरज चोपड़ा ने जेवेलिन पकड़नी सीखी थी। टोक्यो ओलंपिक जाने से पहले ही मुझे विश्वास था कि इस बार नीरज ओलंपिक में जेवेलिन थ्रो में पक्का पदक जीतेगा। आखिरी समय में दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं। जैसे ही नीरज का स्वर्ण पक्का हुआ खुशी के मारे आंखों से आंसू निकल आए। - नसीम अहमद, नीरज के कोच
14 साल का था नीरज, जब मेरे पास आया था: नसीम
मेडल जीतने पर भावुक नसीम ने कहा कि नीरज 2011 से 2015 तक उनके पास पंचकूला के ताऊ देवी लाल स्टेडियम में प्रेक्टिस करते रहे। उन्होंने कहा कि नीरज इसी स्टेडियम के हॉस्टल में रहते थे। उनके चाचा ने मुझसे संपर्क किया था कि इस लड़के को खिलाड़ी बनाना है। नसीम ने कहा कि पंचकूला में सिंथेटिक ट्रैक था। इस वजह से यहां काफी खिलाड़ी प्रेक्टिस के लिए आते थे। उन्होंने कहा कि हॉस्टल में वह इसलिए रहते थे कि गांव दूर था।
नेशनल में जीतने के बाद आभास था कि कीर्तिमान स्थापित करेगा
नसीम अहमद ने कहा कि नीरज में हौसला था, उसी हौसले ने उनको ओलंपिक मेडल दिलवाया। जब नीरज ने नेशनल में गोल्ड मेडल जीते तो उसी समय यह आभास हो गया था कि यह कुछ कीर्तिमान स्थापित करेगा। नसीम अहमद ने कहा कि हॉस्टल में जो डाइट थी वह तो थी ही, साथ ही नीरज और उनके दोस्त सोयाबीन और चने की रोटी भी काफी पसंद करते थे, जिसके लिए वह अलग से इंतजाम करते थे। नसीम अहमद ने बताया कि नीरज करीब पांच घंटे तक अभ्यास करते थे। वह छुट्टियों में भी अपने घर नहीं जाते थे। उन्होंने बताया कि नीरज को सोशल मीडिया या किसी अन्य प्लेटफार्म में कोई रुचि नहीं थी। उन्होंने बताया कि जब उसका सेलेक्शन इंडिया कैंप के लिए हुआ तो उस समय नीरज करीब 74 मीटर तक जेवेलियन थ्रो करते थे।
स्पांसर मिले तो बात बने
नसीम अहमद ने कहा कि एथलेटिक्स में भी यदि स्पांसर मिले तो खिलाड़ियों को काफी लाभ होगा। उन्होंने कहा कि एथलीटों को डाइट की सबसे ज्यादा समस्या होती है। इसके साथ ही देश में एथलीटों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में भी अभी काफी सुधार की गुंजाइश है। यदि ग्रामीण इलाकों में ऐसे सेंटर बनें तो ज्यादा खिलाड़ी निकल सकेंगे।