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Highcourt: कैनेडियन महिला को बच्चे की कस्टडी, पिता पहुंचा हाईकोर्ट; खंडपीठ ने फैसला रखा सुरक्षित
Sat, 03 May 2025 01:04 PM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 03 May 2025 01:04 PM IST
सार
सिंगल बेंच ने फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया था कि चाहे पिता का चरित्र निष्कलंक हो और वह बच्चे की देखभाल के लिए पूरी तरह से सक्षम हो और मां से बिना किसी उचित कारण के उसका अलगाव हुआ हो, लेकिन फिर भी बच्चे के कल्याण की दृष्टि से उसकी कस्टडी मां के पास होना ही अधिक उपयुक्त होगा।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की सिंगल बेंच की ओर से कैनेडियन महिला की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए उसके नाबालिग बेटे को पिता की कस्टडी से मुक्त कराकर मां को सौंपने के आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी गई है।
पिता पर आरोप था कि उसने कनाडा की अदालत के आदेश का उल्लंघन करते हुए बच्चे को भारत में जबरन रोके रखा। खंडपीठ ने सभी पक्षों को सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
सिंगल बेंच ने फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया था कि चाहे पिता का चरित्र निष्कलंक हो और वह बच्चे की देखभाल के लिए पूरी तरह से सक्षम हो और मां से बिना किसी उचित कारण के उसका अलगाव हुआ हो, लेकिन फिर भी बच्चे के कल्याण की दृष्टि से उसकी कस्टडी मां के पास होना ही अधिक उपयुक्त होगा। खासकर तब, जब बच्चा बहुत ही नाजुक उम्र में हो या उसकी सेहत नाजुक हो, तो मां की स्वाभाविक देखभाल और भावनात्मक लगाव की तुलना किसी भी वैकल्पिक देखभाल से नहीं की जा सकती।
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मां ने अदालत को बताया था कि पिता को कनाडाई अदालत ने मात्र 2 से 3 हफ्तों के लिए बच्चे के साथ भारत आने की अनुमति दी थी, जो कुछ शर्तों के साथ थी। पिता ने इन शर्तों का उल्लंघन करते हुए न केवल कनाडा वापसी से इन्कार किया बल्कि भारत सरकार से वीजा विस्तार भी हासिल कर लिया, जबकि उसने कनाडाई अदालत के उस आदेश को छुपा लिया जिसमें मां को बच्चे की संपूर्ण कस्टडी और निर्णय लेने का अधिकार सौंपा गया था। इस फैसले को मोहाली निवासी पिता ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए रद्द करने की मांग की है। हाईकोर्ट ने इस मामले में अब फैसला सुरक्षित रख लिया है।
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पिता पर आरोप था कि उसने कनाडा की अदालत के आदेश का उल्लंघन करते हुए बच्चे को भारत में जबरन रोके रखा। खंडपीठ ने सभी पक्षों को सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
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सिंगल बेंच ने फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया था कि चाहे पिता का चरित्र निष्कलंक हो और वह बच्चे की देखभाल के लिए पूरी तरह से सक्षम हो और मां से बिना किसी उचित कारण के उसका अलगाव हुआ हो, लेकिन फिर भी बच्चे के कल्याण की दृष्टि से उसकी कस्टडी मां के पास होना ही अधिक उपयुक्त होगा। खासकर तब, जब बच्चा बहुत ही नाजुक उम्र में हो या उसकी सेहत नाजुक हो, तो मां की स्वाभाविक देखभाल और भावनात्मक लगाव की तुलना किसी भी वैकल्पिक देखभाल से नहीं की जा सकती।
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मां ने अदालत को बताया था कि पिता को कनाडाई अदालत ने मात्र 2 से 3 हफ्तों के लिए बच्चे के साथ भारत आने की अनुमति दी थी, जो कुछ शर्तों के साथ थी। पिता ने इन शर्तों का उल्लंघन करते हुए न केवल कनाडा वापसी से इन्कार किया बल्कि भारत सरकार से वीजा विस्तार भी हासिल कर लिया, जबकि उसने कनाडाई अदालत के उस आदेश को छुपा लिया जिसमें मां को बच्चे की संपूर्ण कस्टडी और निर्णय लेने का अधिकार सौंपा गया था। इस फैसले को मोहाली निवासी पिता ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए रद्द करने की मांग की है। हाईकोर्ट ने इस मामले में अब फैसला सुरक्षित रख लिया है।