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Chandigarh News: दक्षिण हरियाणा में भाजपा की बदलेगी राजनीति-रणनीति
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अहीरवाल के दो दिग्गज सांसद राव इंद्रजीत व सांसद धर्मबीर सिंह ने राजनीति से संन्यास लेने का दिया संकेत
दोनों के चुनाव नहीं लड़ने पर पार्टी के अंदर नए चेहरों पर चर्चा शुरू, जातीय व क्षेत्रीय समीकरण के आधार पर उभरेगी नई रणनीति
आशीष वर्मा
चंडीगढ़। राजनीति में कब क्या हो जाए किसी को पता नहीं होता। लोकसभा व विधानसभा चुनाव को बमुश्किल से एक से डेढ़ साल बीता और दक्षिण हरियाणा की राजनीति करवटें बदलने लगी है। अहीरवाल क्षेत्र के दो भाजपा दिग्गज सांसद और घनिष्ठ मित्र धर्मबीर सिंह और राव इंद्रजीत ने 2029 के चुनाव से पहले ही राजनीति से संन्यास लेने के संकेत दे दिए हैं। उनके इस इशारों से अब दोनों ही लोकसभा क्षेत्रों में नए समीकरणों और चेहरों पर चर्चा शुरू हो गई है। चर्चा चल रही है कि भाजपा के अंदर ऐसे कौन से चेहरे हैं जो इन लोकसभा क्षेत्रों में पार्टी का प्रतिनिधित्वि करने के साथ यह सीट भाजपा की झोली में डाल सकते हैं। एक चर्चा यह भी है कि कहीं यह जानबूझकर तो बयान नहीं दिए गए ताकि किसी के लिए जमीन तैयार की जा सके।
करीब एक सप्ताह पहले भिवानी-महेंद्रगढ़ लोकसभा के सांसद धर्मबीर सिंह ने नारनौल में एक प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि अब सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का समय आ गया है। अगले चुनाव तक उनकी उम्र काम करने की नहीं रहेगी। इसके छह दिन बाद ही छह बार के सांसद राव इंद्रजीत सिंह ने भी नारनौल में कहा कि अब मैं 74 साल का हो गया हूं। ज्यादा घूमता, फिरता नहीं हूं मगर अब मेरी बेटी सक्रिय हो गई है। मैं भी चाहता हूं कि राजनीति में युवा ज्यादा आएं।
भिवानी-महेंद्रगढ़ सीट पर जाट या अहीर होगा चेहरा
सांसद धर्मबीर सिंह भिवानी-महेंद्रगढ़ सीट से लगातार तीन बार से चुनाव जीत रहे हैं। इस सीट के अंतर्गत तीन जिले महेंद्रगढ़, चरखीदादरी और भिवानी आते हैं। इस सीट पर जाट वोटर करीब 4.25 लाख और अहीर 3.4 लाख हैं। भाजपा की लगातार तीन जीत का समीकरण यही रहा है कि अहीरवाल के गढ़ महेंद्रगढ़ से पार्टी बड़ी बढ़त लेती है। भिवानी व चरखीदादरी में सांसद धर्मबीर सिंह का अपना निजी वोट बैंक है और दोनों क्षेत्रों से जाट वोटरों को भी झटकते हैं। धर्मबीर की जीत में एक अहम फैक्टर राव इंद्रजीत का भी रहा है। अहीरवाल से वे काफी वोट धर्मबीर सिंह के खाते में डलवाते हैं। ऐसी स्थिति में पार्टी के सामने जाट या अहीर चेहरा ही होगा। जाट चेहरों की बात करें तो सबसे बड़ा नाम पूर्व कैबिनेट मंत्री जेपी दलाल का आता है। भले ही वह चुनाव हार गए हों लेकिन आज भी उनके कामों की चर्चा होती है। जाट चेहरे के तौर पर दूसरा नाम किरण चौधरी और उनकी बेटी श्रुति चौधरी का आता है। मां-बेटी चौधरी बंसीलाल की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। वहीं, यदि अहीर यानी यादव चेहरे की बात करें तो पहला नाम पूर्व मंत्री अभय यादव का आता है। हालांकि साल 2024 का वह भी चुनाव हार गए हैं। मगर उनके विकास कार्यों को लेकर आज भी उनके नामों की चर्चा होती है।
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अहीर बिरादरी से आरती राव के नाम की भी चर्चा
यह किसी से छिपा नहीं है कि राव इंद्रजीत और धर्मबीर सिंह घनिष्ठ मित्र हैं। एक चर्चा यह भी कि एक सप्ताह के भीतर दोनों का बयान आना कहीं कोई पटकथा तो नहीं लिखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक इस पटकथा को आरती राव के लिए नई जमीन तैयार करने के नजरिये से भी देख रहे हैं। राव इंद्रजीत के बयान से अंदाजा लगाया जा रहा है कि उन्होंने संदेश दे दिया है कि अब उनकी राजनीति की विरासत उनकी बेटी आरती राव संभालेंगी। राव इंद्रजीत ने गुरुग्राम लोकसभा क्षेत्र से 2024 का चुनाव मात्र 75,079 वोटों से जीता था जबकि 2019 में 3.86 लाख वोटों से जीत दर्ज की थी। ऐसे में 2029 की चुनावी डगर इतनी आसान नहीं होने वाली। ऐसे में जब वे अपनी बेटी को राजनीतिक विरासत सौंपने की तैयारी कर रहे हों तो वे उनके लिए जमीन भी तैयार करेंगे। वरना चार साल पहले ही इस तरह का बयान देना किसी के गले नहीं उतर रहा है। आरती राव अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए लोगों की समस्याएं सुन रहीं हैं। चंडीगढ़ में भी सप्ताह दो दिन बैठती हैं।
गुरुग्राम में राव नरबीर को आगे बढ़ा रही है पार्टी
राव इंद्रजीत के बार गुरुग्राम से पार्टी का चेहरा काैन होगा। इसको लेकर भी चर्चा गर्म है। यहां से भी पार्टी का चेहरा यादव ही रहने वाला है। ऐसे में पार्टी के सामने दो विकल्प हो सकते हैं। पहला कैबिनेट मंत्री राव नरबीर। जब से राव नरबीर चुनाव जीते हैं, पार्टी उन्हें गुरुग्राम में आगे बढ़ा रही है। पिछले महीने मेट्रो के शिलान्यास के मौके पर मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री के साथ सिर्फ वही मौजूद थे जबकि राव इंद्रजीत कार्यक्रम में नहीं थे। मानेसर के मेयर पर भी उनका आशीर्वाद है। ऐसे में पार्टी के लिए वह एक चेहरा हो सकते हैं। दूसरा चेहरा केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव हो सकते हैं। हालांकि अलवर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने से पहले वह गुरुग्राम में काफी सक्रिय थे। बाद में उन्हें अलवर शिफ्ट कर दिया गया था।
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दोनों के चुनाव नहीं लड़ने पर पार्टी के अंदर नए चेहरों पर चर्चा शुरू, जातीय व क्षेत्रीय समीकरण के आधार पर उभरेगी नई रणनीति
आशीष वर्मा
चंडीगढ़। राजनीति में कब क्या हो जाए किसी को पता नहीं होता। लोकसभा व विधानसभा चुनाव को बमुश्किल से एक से डेढ़ साल बीता और दक्षिण हरियाणा की राजनीति करवटें बदलने लगी है। अहीरवाल क्षेत्र के दो भाजपा दिग्गज सांसद और घनिष्ठ मित्र धर्मबीर सिंह और राव इंद्रजीत ने 2029 के चुनाव से पहले ही राजनीति से संन्यास लेने के संकेत दे दिए हैं। उनके इस इशारों से अब दोनों ही लोकसभा क्षेत्रों में नए समीकरणों और चेहरों पर चर्चा शुरू हो गई है। चर्चा चल रही है कि भाजपा के अंदर ऐसे कौन से चेहरे हैं जो इन लोकसभा क्षेत्रों में पार्टी का प्रतिनिधित्वि करने के साथ यह सीट भाजपा की झोली में डाल सकते हैं। एक चर्चा यह भी है कि कहीं यह जानबूझकर तो बयान नहीं दिए गए ताकि किसी के लिए जमीन तैयार की जा सके।
करीब एक सप्ताह पहले भिवानी-महेंद्रगढ़ लोकसभा के सांसद धर्मबीर सिंह ने नारनौल में एक प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि अब सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का समय आ गया है। अगले चुनाव तक उनकी उम्र काम करने की नहीं रहेगी। इसके छह दिन बाद ही छह बार के सांसद राव इंद्रजीत सिंह ने भी नारनौल में कहा कि अब मैं 74 साल का हो गया हूं। ज्यादा घूमता, फिरता नहीं हूं मगर अब मेरी बेटी सक्रिय हो गई है। मैं भी चाहता हूं कि राजनीति में युवा ज्यादा आएं।
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भिवानी-महेंद्रगढ़ सीट पर जाट या अहीर होगा चेहरा
सांसद धर्मबीर सिंह भिवानी-महेंद्रगढ़ सीट से लगातार तीन बार से चुनाव जीत रहे हैं। इस सीट के अंतर्गत तीन जिले महेंद्रगढ़, चरखीदादरी और भिवानी आते हैं। इस सीट पर जाट वोटर करीब 4.25 लाख और अहीर 3.4 लाख हैं। भाजपा की लगातार तीन जीत का समीकरण यही रहा है कि अहीरवाल के गढ़ महेंद्रगढ़ से पार्टी बड़ी बढ़त लेती है। भिवानी व चरखीदादरी में सांसद धर्मबीर सिंह का अपना निजी वोट बैंक है और दोनों क्षेत्रों से जाट वोटरों को भी झटकते हैं। धर्मबीर की जीत में एक अहम फैक्टर राव इंद्रजीत का भी रहा है। अहीरवाल से वे काफी वोट धर्मबीर सिंह के खाते में डलवाते हैं। ऐसी स्थिति में पार्टी के सामने जाट या अहीर चेहरा ही होगा। जाट चेहरों की बात करें तो सबसे बड़ा नाम पूर्व कैबिनेट मंत्री जेपी दलाल का आता है। भले ही वह चुनाव हार गए हों लेकिन आज भी उनके कामों की चर्चा होती है। जाट चेहरे के तौर पर दूसरा नाम किरण चौधरी और उनकी बेटी श्रुति चौधरी का आता है। मां-बेटी चौधरी बंसीलाल की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। वहीं, यदि अहीर यानी यादव चेहरे की बात करें तो पहला नाम पूर्व मंत्री अभय यादव का आता है। हालांकि साल 2024 का वह भी चुनाव हार गए हैं। मगर उनके विकास कार्यों को लेकर आज भी उनके नामों की चर्चा होती है।
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अहीर बिरादरी से आरती राव के नाम की भी चर्चा
यह किसी से छिपा नहीं है कि राव इंद्रजीत और धर्मबीर सिंह घनिष्ठ मित्र हैं। एक चर्चा यह भी कि एक सप्ताह के भीतर दोनों का बयान आना कहीं कोई पटकथा तो नहीं लिखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक इस पटकथा को आरती राव के लिए नई जमीन तैयार करने के नजरिये से भी देख रहे हैं। राव इंद्रजीत के बयान से अंदाजा लगाया जा रहा है कि उन्होंने संदेश दे दिया है कि अब उनकी राजनीति की विरासत उनकी बेटी आरती राव संभालेंगी। राव इंद्रजीत ने गुरुग्राम लोकसभा क्षेत्र से 2024 का चुनाव मात्र 75,079 वोटों से जीता था जबकि 2019 में 3.86 लाख वोटों से जीत दर्ज की थी। ऐसे में 2029 की चुनावी डगर इतनी आसान नहीं होने वाली। ऐसे में जब वे अपनी बेटी को राजनीतिक विरासत सौंपने की तैयारी कर रहे हों तो वे उनके लिए जमीन भी तैयार करेंगे। वरना चार साल पहले ही इस तरह का बयान देना किसी के गले नहीं उतर रहा है। आरती राव अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए लोगों की समस्याएं सुन रहीं हैं। चंडीगढ़ में भी सप्ताह दो दिन बैठती हैं।
गुरुग्राम में राव नरबीर को आगे बढ़ा रही है पार्टी
राव इंद्रजीत के बार गुरुग्राम से पार्टी का चेहरा काैन होगा। इसको लेकर भी चर्चा गर्म है। यहां से भी पार्टी का चेहरा यादव ही रहने वाला है। ऐसे में पार्टी के सामने दो विकल्प हो सकते हैं। पहला कैबिनेट मंत्री राव नरबीर। जब से राव नरबीर चुनाव जीते हैं, पार्टी उन्हें गुरुग्राम में आगे बढ़ा रही है। पिछले महीने मेट्रो के शिलान्यास के मौके पर मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री के साथ सिर्फ वही मौजूद थे जबकि राव इंद्रजीत कार्यक्रम में नहीं थे। मानेसर के मेयर पर भी उनका आशीर्वाद है। ऐसे में पार्टी के लिए वह एक चेहरा हो सकते हैं। दूसरा चेहरा केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव हो सकते हैं। हालांकि अलवर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने से पहले वह गुरुग्राम में काफी सक्रिय थे। बाद में उन्हें अलवर शिफ्ट कर दिया गया था।