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Ram Mandir Bhumi Pujan: डॉ. प्रीतम सिंह ने रामलला को विराजमान करने में निभाई थी भूमिका
Wed, 05 Aug 2020 12:05 PM IST
खुशबू गोयल
राजेश शांडिल्य, कुरुक्षेत्र
राजेश शांडिल्य, कुरुक्षेत्र
Published by: खुशबू गोयल
Updated Wed, 05 Aug 2020 12:05 PM IST
सार
- हर्षित हूं कि मेरे जैसे अनगिनत रामभक्तों का सपना हो रहा है पूरा: डॉ. प्रीतम
- 6 दिसंबर 1992 के पुराने वीडियो में विवादित ढांचे पर दिखते हैं केयू के डॉ. प्रीतम
- 3 को चले, चार को पहुंचे, पांच को घूमे, छह दिसंबर को सुबह चढ़े विवादित ढांचे पर
- घुटने पर हैं जख्म के निशान, उससे पहले और बाद में नहीं गया अयोध्या, अब जाऊंगा
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राम मंदिर में विराजमान रामलला
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सियापति की अयोध्या में आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस भूमि पर मंदिर निर्माण का शिलान्यास करेंगे, उस सपने को साकार होता देख डॉ. प्रीतम सिंह जैसे अनगिनत जुनूनी रामभक्त हर्षित हैं। इसका बड़ा कारण ये है कि जिस जगह विवादित ढांचा था, उसे ढहाने, मलबे साफ करने, आधी रात में रामलला को विराजमान कर तंबू गाड़ने में इनकी विशेष भूमिका थी।
इनमें से एक किरदार है डॉ. प्रीतम सिंह। जो उस समय करनाल खालसा कॉलेज में बीए द्वितीय वर्ष के छात्र थे, तब उनकी उम्र थी करीब 20 वर्ष। राजकीय विद्यालय में बतौर शिक्षक सेवाएं दे चुके डॉ. प्रीतम सिंह की नियुक्ति इसी साल कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के आंबेडकर अध्ययन केंद्र में बतौर सहायक निदेशक के पद पर हुई थी।
संघ के तेजतर्रार कार्यकर्ताओं में शुमार डॉ. प्रीतम सिंह वो सख्श हैं, जो कि 6 दिसंबर 1992 की सुबह साढ़े 9 बजे करीब 12 युवकों के साथ अयोध्या में विवादित ढांचे पर चढ़े थे। डॉ. प्रीतम ने अमर उजाला से बातचीत में उस घटनाक्रम की यादों को साझा किया।
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उन्होंने बताया कि करनाल जिले के गांव कैरवाली वासी संघ कार्यकर्ता सुरेश शर्मा शारीरिक रूप से उनसे ज्यादा मजबूत थे, वो भगवा ध्वज को हाथ में लेकर ऊपर चढ़े, फिर उन्हें ऊपर खींचा। इसके बाद सुरेश ने गुंबद पर रस्सी डाली, जिसके सहारे कई युवक एक के बाद एक ऊपर चढ़े।
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इनमें से एक किरदार है डॉ. प्रीतम सिंह। जो उस समय करनाल खालसा कॉलेज में बीए द्वितीय वर्ष के छात्र थे, तब उनकी उम्र थी करीब 20 वर्ष। राजकीय विद्यालय में बतौर शिक्षक सेवाएं दे चुके डॉ. प्रीतम सिंह की नियुक्ति इसी साल कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के आंबेडकर अध्ययन केंद्र में बतौर सहायक निदेशक के पद पर हुई थी।
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संघ के तेजतर्रार कार्यकर्ताओं में शुमार डॉ. प्रीतम सिंह वो सख्श हैं, जो कि 6 दिसंबर 1992 की सुबह साढ़े 9 बजे करीब 12 युवकों के साथ अयोध्या में विवादित ढांचे पर चढ़े थे। डॉ. प्रीतम ने अमर उजाला से बातचीत में उस घटनाक्रम की यादों को साझा किया।
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उन्होंने बताया कि करनाल जिले के गांव कैरवाली वासी संघ कार्यकर्ता सुरेश शर्मा शारीरिक रूप से उनसे ज्यादा मजबूत थे, वो भगवा ध्वज को हाथ में लेकर ऊपर चढ़े, फिर उन्हें ऊपर खींचा। इसके बाद सुरेश ने गुंबद पर रस्सी डाली, जिसके सहारे कई युवक एक के बाद एक ऊपर चढ़े।
रात को साढ़े 12 बजे श्रीरामलला को विराजमान कर तंबू लगाया
डॉ. प्रीतम के मुताबिक उस समय तक उनके घुटने पर चोट लग चुकी थी, जिसकी वजह से रक्त बहने लगा। तभी करीब 15 से 20 युवक इनमें राजस्थान के युवक भी थे, इन्होंने गुंबद के कंगुरों को तहस नहस करना शुरू कर दिया। डॉ. प्रीतम सिंह की माने तो वे साढ़े 12 बजे तक विवादित ढांचे के ऊपर ही डटे रहे।
दूसरी ओर से नेता तोड़फोड़ न करने का आह्वान माइक से करते रहे, लेकिन लोग बढ़ते गये और देखते ही देखते पूरा विवादित ढांचा ढहा दिया। उन्होंने बताया कि इसके बाद रात 10 बजे उन्हें यह पता चला कि मुख्यमंत्री कल्याण सिंह शाम को इस्तीफा दे चुके हैं और केंद्र सरकार ने यूपी में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया है। इसलिये रात को ही विवादित ढांचे का मलबा हटाकर मंदिर निर्माण शुरू होगा।
डॉ. प्रीतम सिंह ने बताया कि वहां सब इतनी तेजी से हुआ कि न केवल देखते ही देखते मलबा हट गया। रात को साढ़े 12 बजे श्रीरामलला जी को विराजमान कर तंबू लगाया गया। हंसते हुए डॉ. प्रीतम सिंह ने कहा कि वह सुबह ही रामनाम के टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गये और करनाल अपने गांव मुबारकाबाद वापस आ गये। आज भी उनके घुटनों पर चोट के निशान हैं।
दूसरी ओर से नेता तोड़फोड़ न करने का आह्वान माइक से करते रहे, लेकिन लोग बढ़ते गये और देखते ही देखते पूरा विवादित ढांचा ढहा दिया। उन्होंने बताया कि इसके बाद रात 10 बजे उन्हें यह पता चला कि मुख्यमंत्री कल्याण सिंह शाम को इस्तीफा दे चुके हैं और केंद्र सरकार ने यूपी में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया है। इसलिये रात को ही विवादित ढांचे का मलबा हटाकर मंदिर निर्माण शुरू होगा।
डॉ. प्रीतम सिंह ने बताया कि वहां सब इतनी तेजी से हुआ कि न केवल देखते ही देखते मलबा हट गया। रात को साढ़े 12 बजे श्रीरामलला जी को विराजमान कर तंबू लगाया गया। हंसते हुए डॉ. प्रीतम सिंह ने कहा कि वह सुबह ही रामनाम के टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गये और करनाल अपने गांव मुबारकाबाद वापस आ गये। आज भी उनके घुटनों पर चोट के निशान हैं।
तीन दिसंबर को करनाल से हुए थे रवाना
तीन दिसंबर को करनाल से अयोध्या जी के लिये रवाना हुए थे और 4 दिसंबर को वहां पहुंचे। दो दिन तक वहीं रहे, पांच को पूरी अयोध्याजी के दर्शन किये, 6 दिसंबर को सुबह सरयूजी में स्नान किया, पूजा की इसके बाद रेत इत्यादि लेकर गये, लेकिन साढ़े नौ बजे उन्होंने कुछ कारसेवकों के साथ गुंबद पर चढ़ने की योजना बनाई और ऊपर चढ़ गये।
एक दिन पहले की थी पीछे से चढ़ने की प्लानिंग
डॉ. प्रीतम के मुताबिक पांच दिसंबर को उन्होंने विवादित ढांचे के पीछे जाकर मौका देखा, जहां जंगल की तरह घास खड़ी थी। इस जगह से ऊपर गुंबद तक जाना आसान था, लेकिन यहां तीखी ब्लेडदार फैंसिंग थी, जिसे उन्होंने काटने का प्रयास किया, मगर सफल नहीं हुए, क्योंकि दूर तैनात एक जवान की नजर पड़ गई थी। अगले दिन इसी जगह से जोशीले नौजवान विवादित ढांचे पर चढ़े थे, जिनमें दो करनाल जिले के घरौंडा क्षेत्र के थे।
1992 के वीडियो, 8 दिसंबर 1992 की अमर उजाला अखबार
राममंदिर आंदोलन में सक्रिय रहे सुरेश जोशी के मुताबिक 1992 में जब विवादित ढांचा गिराया जा रहा था, उस समय के एक वीडियो में डॉ. प्रीतम और सुरेश शर्मा भी बीच वाली गुंबद पर चलते ही दिखाई देते हैं। राममंदिर आंदोलन में कुरुक्षेत्र के अतुल शास्त्री और भाजपा नेता कृष्ण बजाज भी पुलिस लाठीचार्ज में चोटिल हुए थे। वहीं, जोशी ने बताया कि उन्होंने आज भी 8 दिसंबर 1992 का अमर उजाला की प्रति संभाल कर रखी हुई है।
एक दिन पहले की थी पीछे से चढ़ने की प्लानिंग
डॉ. प्रीतम के मुताबिक पांच दिसंबर को उन्होंने विवादित ढांचे के पीछे जाकर मौका देखा, जहां जंगल की तरह घास खड़ी थी। इस जगह से ऊपर गुंबद तक जाना आसान था, लेकिन यहां तीखी ब्लेडदार फैंसिंग थी, जिसे उन्होंने काटने का प्रयास किया, मगर सफल नहीं हुए, क्योंकि दूर तैनात एक जवान की नजर पड़ गई थी। अगले दिन इसी जगह से जोशीले नौजवान विवादित ढांचे पर चढ़े थे, जिनमें दो करनाल जिले के घरौंडा क्षेत्र के थे।
1992 के वीडियो, 8 दिसंबर 1992 की अमर उजाला अखबार
राममंदिर आंदोलन में सक्रिय रहे सुरेश जोशी के मुताबिक 1992 में जब विवादित ढांचा गिराया जा रहा था, उस समय के एक वीडियो में डॉ. प्रीतम और सुरेश शर्मा भी बीच वाली गुंबद पर चलते ही दिखाई देते हैं। राममंदिर आंदोलन में कुरुक्षेत्र के अतुल शास्त्री और भाजपा नेता कृष्ण बजाज भी पुलिस लाठीचार्ज में चोटिल हुए थे। वहीं, जोशी ने बताया कि उन्होंने आज भी 8 दिसंबर 1992 का अमर उजाला की प्रति संभाल कर रखी हुई है।