{"_id":"5e52e7218ebc3ef37d1338c5","slug":"attack-on-education-system-through-comedy-chandigarh-news-pkl3674873128","type":"story","status":"publish","title_hn":"हास्य नाटक के माध्य से शिक्षा व्यवस्था पर किया प्रहार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हास्य नाटक के माध्य से शिक्षा व्यवस्था पर किया प्रहार
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चंडीगढ़। दकियानूसी धारणाओं, संस्थाओं और प्राथमिकता पर सवाल उठाते हुए नाटक ‘जात ही पूछो साधु की’ ने रविवार को दर्शकों को खूब हंसाया। विजय तेंदुलकर के लिखे इस नाटक का निर्देशन राजिंदर नाथ ने किया। नाटक में हास्य व्यंग्य के साथ व्यवस्थाओं पर कड़ा प्रहार किया गया। शिक्षा और जाति व्यवस्था पर कटाक्ष करते इस नाटक में तेंदुलकर ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में जातिवाद को व्यंग्यात्मक तरीके से पेश किया है।
नाटक की शुरुआत महीपत नामक किरदार से होती है जो पिछड़ी जाति का एक बेरोजगार युवक है। वो हर हाल में एमए करना चाहता है। अंत में वो थर्ड डिवीजन एमए पास कर लेता है। लेकिन हिंदी लेक्चरार पद के लिए अनेक जगह आवेदन करने के बाद भी उसे इंटरव्यू का बुलावा नहीं जाता, क्योंकि वो पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखता है। इसी बीच उसे अचानक एक ग्रामीण कॉलेज में नौकरी मिल जाती है, क्योंकि उस पद के लिए वह अकेला उम्मीदवार होता है। कॉलेज के चेयरमैन की मूर्ख भांजी नलिनी को भी कुछ दिन बाद हिंदी लेक्चरार के रूप में नियुक्त कर लिया जाता है। अपनी नौकरी बचाने के लिए महीपत चेयरमैन की भांजी नलिनी से इश्क लड़ाने और विवाह रचाने की योजना बनाता है। इश्क तो परवान चढ़ता है, लेकिन अपने ऊंचे खानदान की इज्जत की खातिर नलिनी मां-बाप के दबाव में महीपत को ठेंगा दिखा जाती है। अंत में महीपत एक बार फिर पढ़े-लिखे बेरोजगार की पोजीशन में पहुंच जाता है।
चंडीगढ़ संस्कृति विभाग और एनएसडी दिल्ली की ओर से थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन आयोजित नाटक में कलाकार की भूमिका में शुभम पारीक, आशुतोष बनर्जी, वीरेंद्र सिंह, नवीन सिंह ठाकुर, मोतीलाल खरे, विषेश्वर, मनीष दुबे, दीप कुमार, सुरेश शर्मा, शाहंवाज खान और पराग ने निभाई। इसका निर्देशन राजेंद्रनाथ ने किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
नाटक की शुरुआत महीपत नामक किरदार से होती है जो पिछड़ी जाति का एक बेरोजगार युवक है। वो हर हाल में एमए करना चाहता है। अंत में वो थर्ड डिवीजन एमए पास कर लेता है। लेकिन हिंदी लेक्चरार पद के लिए अनेक जगह आवेदन करने के बाद भी उसे इंटरव्यू का बुलावा नहीं जाता, क्योंकि वो पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखता है। इसी बीच उसे अचानक एक ग्रामीण कॉलेज में नौकरी मिल जाती है, क्योंकि उस पद के लिए वह अकेला उम्मीदवार होता है। कॉलेज के चेयरमैन की मूर्ख भांजी नलिनी को भी कुछ दिन बाद हिंदी लेक्चरार के रूप में नियुक्त कर लिया जाता है। अपनी नौकरी बचाने के लिए महीपत चेयरमैन की भांजी नलिनी से इश्क लड़ाने और विवाह रचाने की योजना बनाता है। इश्क तो परवान चढ़ता है, लेकिन अपने ऊंचे खानदान की इज्जत की खातिर नलिनी मां-बाप के दबाव में महीपत को ठेंगा दिखा जाती है। अंत में महीपत एक बार फिर पढ़े-लिखे बेरोजगार की पोजीशन में पहुंच जाता है।
विज्ञापन
चंडीगढ़ संस्कृति विभाग और एनएसडी दिल्ली की ओर से थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन आयोजित नाटक में कलाकार की भूमिका में शुभम पारीक, आशुतोष बनर्जी, वीरेंद्र सिंह, नवीन सिंह ठाकुर, मोतीलाल खरे, विषेश्वर, मनीष दुबे, दीप कुमार, सुरेश शर्मा, शाहंवाज खान और पराग ने निभाई। इसका निर्देशन राजेंद्रनाथ ने किया।
विज्ञापन