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कौन सा मौलिक अधिकार बेटे को पिता का अंतिम संस्कार करने का अधिकार देता है: हाईकोर्ट

Wed, 08 Feb 2017 09:29 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Wed, 08 Feb 2017 09:29 AM IST
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Ashutosh maharaj case, punjab and haryana highcourt, chandigarh news
Punjab And Haryana Highcourt Chandigarh - फोटो : File Photo
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के संस्थापक आशुतोष महाराज के कथित पुत्र दलीप झा से पूछा है कि किस मौलिक अधिकार के तहत बेटा पिता के शव का अंतिम संस्कार करे, इसकी अनिवार्यता जाहिर होती है।
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हाईकोर्ट ने यह सवाल दलीप झा की तरफ से पिता के शव का अंतिम संस्कार करने की अनुमति मांगने पर पूछा है। मामले की सुनवाई के दौरान मंगलवार को संस्थान और कथित पुत्र दलीप झा की दलीलें पूरी हो गई। इस बीच पंजाब सरकार की ओर से अपील की गई कि मामले में उनका पक्ष सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया रखेंगे, ऐसे में केस की अगली सुनवाई आगामी एक मार्च को तय की जाए। हाईकोर्ट ने सरकार की दलील को स्वीकार करते हुए सुनवाई एक मार्च तक टाल दी है।
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मंगलवार को सुनवाई आरंभ होते ही दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के संस्थापक आशुतोष महाराज के समर्थकों के वकील की ओर से दलीलें आरंभ की गई। कोर्ट से अपील करते हुए कहा गया कि आशुतोष महाराज समाधि में हैं। समर्थकों का विश्वास है कि वह वापस आएंगे। यदि उनके शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया तो समर्थकों की भावनाएं आहत होंगी। 
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोर्ट समाधि के विषय में टिप्पणी नहीं कर सकता, क्योंकि समाधि के बारे में न तो कोई कानून है और न ही इसको संविधान का हिस्सा ही बनाया गया है। ऐसे में आशुतोष महाराज की समाधि की स्थिति पर नहीं, बल्कि उनके शरीर को लेकर अपनी बहस आरंभ करे। इस पर कहा गया कि आशुतोष महाराज ने समाधि से पहले अपने समर्थकों को यह बता दिया था कि वे समाधि में जाएंगे और इस दौरान उनके शरीर को संरक्षित रखा जाए। 

'संन्यासी वो, जो सुख सुविधाओं का त्याग करे'

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highcourt - फोटो : File Photo
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतें कानून और संविधान के अनुसार चलती हैं, इसलिए कानूनी प्रावधानों केतहत दलीलें दी जाएं। इस दौरान जब संस्थान, समर्थकों, याची की दलीलें पूरी होने पर हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित करना चाहा तो पंजाब सरकार ने कहा कि सरकार का पक्ष रखने के लिए सॉलिसिटर जनरल ने एक मार्च तक का समय मांगा है। 

संन्यासी वो, जो सुख सुविधाओं का त्याग करे
कोर्ट में सुनवाई के दौरान सन्यासी शब्द पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की। कहा कि असल में सन्यासी वह है जो सांसारिक सुख का त्याग कर जीवन जी रहा हो। सुख सुविधाओं से लैस सन्यास कैसे हो सकता है। जस्टिस महेश ग्रोवर ने उदाहरण देते हुए कहा कि महात्मा बुद्ध ने अपना अलग मार्ग चुना और सभी सुविधाओं से किनारा कर सन्यास के मार्ग पर चले।

एनडी तिवारी की तर्ज पर डीएनए मिलान की मांग 
दलीप झा की ओर से एडवोकेट एसपी सोई ने अपनी दलील में कहा कि आशुतोष महाराज की वोटर लिस्ट में जो उनके पिता का नाम है, वही नाम दलीप के दादा का भी है। इसके साथ ही एनडी तिवारी की तर्ज पर यदि आशुतोष महाराज और दलीप झा के डीएनए का मिलान करवा लिया जाए तो दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा।

हाईकोर्ट ने उठाए तीन सवाल

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स्वामी विवेकानंद की समाधि की दलील
सुनवाई के दौरान समर्थकों की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि सांई और विवेकानंद मामले में भी समाधि का उदाहरण मिलता है। उन स्थितियों में भी शरीर मृत अवस्था में था। आशुतोष महाराज की स्थिति भी इसी प्रकार की है और वे शीघ्र अपने शरीर में वापस लौटेंगे।

हाईकोर्ट ने उठाए तीन सवाल
1. हाईकोर्ट ने कहा, आशुतोष महाराज ने समाधि ली और उनके कई समर्थक भी हैं। ऐसे में उनका कोई समर्थक सामने आए और उनकी भांति ही समाधि की स्थिति कोर्ट को दिखा दे। क्या ऐसा कोई अनुयायी है?
2. यदि आशुतोष महाराज समाधि में हैं तो उनके समर्थक उनसे अनुरोध करें कि वे पुन: अपने शरीर में वापस आ जाएं। एक बार यह हो जाए चाहे उसके बाद दोबारा समाधि की स्थिति में चले जाएं। क्या ये संभव है?
3. हाईकोर्ट ने पूछा कि समाधि की स्थिति से वापस आने के लिए क्या वही शरीर अनिवार्य है। क्या समाधि से वापस आने के बाद किसी अन्य शरीर में आत्मा का प्रवेश नहीं करवाया जा सकता? 
 
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