काला पानी: जहां गूंजती थी चीखें, अब घूमते हैं पर्यटक
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‘काला पानी।’ पंजाब वासियों के सीने में यह शब्द आज भी तीखे तीर की तरह चुभता है, क्योंकि आजादी से पहले देश के अन्य हिस्सों की तरह ही अनेक पंजाबियों ने वहां की जेल में भारत की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दीं।
आज ‘काला पानी’, यानी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भारत के एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो चुका है। लेकिन वहां की सेल्युलर जेल की दीवारें, तंग कोठरियां, आजादी के उन सैकड़ों परवानों के दर्द को बयां करती हैं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के इंतहा अत्याचार सहे। इस जेल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जा चुका है।
आजादी के लिए जीवन कुर्बान करने वालों की याद में इस जेल में अखंड ज्योति जल रही है। फोटो गैलरी में प्रदर्शित स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें उन्हें सम्मान दे रही हैं। लेकिन हर शाम जेल में होने वाले लाइट एंड साउंड शो में जो दिखता है, वह प्रमाणित करता है कि जो कुछ आजादी के परवानों ने सहा उसका मोल शायद हम भारतवासी, जिंदगी भर न चुका पाएं।
शहीदों को नमन से शुरुआत
पंजाब विधानसभा प्रेस गेलरी कमेटी के 4 से 12 नवंबर 2014 तक आयोजित नौ दिवसीय स्टडी टूर के चौथे दिन 7 तारीख को, हम दोपहर बाद अंडमान-निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर पहुंचे। यूं तो हमारा दल दिल्ली व कोलकाता के रास्ते पोर्ट ब्लेयर पहुंचा था। लेकिन इस सीरीज की शुरुआत शहीदों के नमन से ही करना हम अपना फर्ज समझते हैं।
वहां पहुंचने के बाद शाम को सबसे पहले हम जिस स्थान पर गए, वह था अटलांटा प्वाइंट पर स्थित सेल्युलर जेल। कहने को तो यह हमारा अध्ययन दौरा था, लेकिन मन से यह किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं था। बचपन में दादा-दादी ने ‘काला पानी’ के बारे में जो बताया था और स्टडी टूर पर रवाना होने से पहले नेट पर जो सर्च किया था, उसने इस स्थान के बारे में एक तस्वीर तो दिमाग में बना ही दी थी। खैर, जेल के द्वार पर पहुंच कर शहीदों को नमन करते हुए अंदर प्रवेश किया और फोटो गैलरी से होते हुए, आगे खुले मैदान में पहुंचे। सामने सेंट्रल वॉच टॉवर और उससे जुड़ी जेल कोठरियों की तीन पंक्तियां।
जेल कोठरियों की दो पंक्तियों के बीचो-बीच एक वर्क सेंटर तथा पार्क में एक स्वतंत्रता सेनानी रूपी प्रतिमा। इसके साथ ही शुरू हुआ, गाइड की ओर से दी जाने वाली जानकारी का सिलसिला। रोंगटे खड़े करने वाली जानकारी। ज्यों-ज्यों हम उस गाइड के साथ आगे बढ़ते चले गए, शहीदों के प्रति हमारी श्रद्धा और भावुकता का दायरा इस जेल को घेरने वाले उस समंदर की तरह विशाल होता चला गया, जिसके पानी में फांसी के बाद शहीदों के शव बहा दिए जाते थे।
फांसी सेल से वीर सावरकर की कोठरी तक
जेल में प्रवेश करने के बाद दाईं तरफ आखिर में एक बंद कमरा दिखाई पड़ता है। उससे सटा एक दरवाजा भी है, जो कि बाहर समंदर की तरफ खुलता है। हम इसकी तरफ बढ़े तो पता चला कि यह फांसी सेल है। इसके नीचे व ऊपर दो हिस्से हैं। ऊपर के हिस्से में तीन फंदे और निचले हिस्से में साफ फर्श।
अंग्रेजी शासनकाल में ऊपरी हिस्से में फांसी दिए जाने के बाद फट्टे हटते ही शव नीचे चले जाते थे। फिर वहां से शवों को निकाल कर साथ सटे द्वार से बाहर ले जाकर, किस्ती के जरिये समंदर के बीचो-बीच बहा दिया जाता था।
इसी फांसी सेल के बिलकुल साथ सटी जेल पंक्ति के तीसरी मंजिल पर आखिरी कोठरी में स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर को लगातार 10 साल तक नजरबंद रखा गया था। उद्देश्य यह था कि सावरकर, आए दिन दी जाने वाली फांसियों को देखकर मानसिक रूप से प्रताड़ित हों और टूटकर अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुक जाएं।
इसी वजह से उन्हें लगातार 10 साल यहां रखा गया जबकि अन्य कैदियों को एक कोठरी में 30 दिन से ज्यादा नहीं रखा जाता था। इसके बावजूद वह नहीं टूटे और आज भारत के इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा है।
‘काला पानी’, मतलब जिंदगी खत्म
जेल कोठरियों के बीचो-बीच आगे बढ़े तो सेंट्रल वॉच टॉवर आ गया। इसी से जुड़ी थीं, सभी सात (अब तीन बाकी) जेल पंक्तियां, जिनमें 13.5 गुणा 7 गुणा 10 फुट की 698 एकांत कोठरियां स्थित थीं। इनमें से हरेक के पीछे की तरफ 3 गुना 1 फीट का वेंटिलेटर दिया गया था। ‘काला पानी’ की सजा होने के बाद स्वतंत्रता सेनानियों ने इन्हीं में अपनी जिंदगियां बिताईं और जेल के वर्क हाउस में जुल्म सहते हुए आजादी के लिए कुर्बानियां दे दीं।
सच कहा जाता है कि ‘काला पानी’ की सजा होने का मतलब होता था, जिंदगी खत्म। कोई जेल तोड़कर भागना तो दूर यह भी नहीं सोच सकता था कि शहीदी के बाद उसकी अस्थियां घर पहुंच पाएंगी या नहीं। कारण, सभी कोठरियों में प्रवेश केवल एकमात्र सेंट्रल टॉवर से होता था और अंदर जाने के बाद कैदी एक-दूसरे को मिलना तो दूर, देख तक नहीं सकते थे।
रोंगटे खड़े करती क्रूरता की कहानी
सूर्यास्त के बाद जेल परिसर में दिखाया जाने वाला लाइट एंड साउंड शो रोंगटे खड़े कर देता है। यहां खड़े, अंग्रेजी हुकूमत के जमाने के एक पेड़ की जुबानी बयां किया जाता दर्द, किसी की भी आखें छलकाने के लिए काफी है।
कई-कई किलो तेल निकालने के लिए कोहलू पर आए दिन मशक्कत, निर्माण कार्य के लिए मजदूरी, उचित मात्रा में खाना न दिया जाना, दिए गए टार्गेट के पूरा न होने पर कोड़ों, बेड़ियों, भूखा रखने आदि की सजा, कोड़ों से खून न निकलने तक मारते रहना, बीमार होने पर अस्पताल न भेजना आदि बातें उस वक्त के अंग्रेज जेलर बैरी की क्रूरता के दर्शन करवाने के लिए काफी हैं।
फिर भी शो के अंत में आजादी मिलने पर झूमते स्वतंत्रता सेनानियों के मनोभावों का, पेड़ की जुबानी प्रदर्शन दर्शकों के आंसूं पोंछने में कुछ मदद जरूर करता है। इसी बहाव में बहते हुए, रोशनी में नहाए इस राष्ट्रीय स्मारक को नमन करके हमारी पहले दिन की पोर्ट ब्लेयर यात्रा का समापन हुआ।