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बढ़ाएगा साहित्य का मान, अमर उजाला का 'शब्द सम्मान'...प्रस्ताव भेजें पुरस्कार जीतें
जगजीवन मीत/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 29 Mar 2018 02:08 PM IST
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अमर उजाला का 'शब्द सम्मान'
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साहित्य का, साहित्य के लिए और साहित्य को ही समर्पित, अमर उजाला की नायाब पहल...शब्द सम्मान। भेजें अपने प्रस्ताव और जीतें पुरस्कार। अमर उजाला शब्द सम्मान के रूप में साहित्य का, साहित्य के लिए और साहित्य को ही समर्पित पुरस्कार शुरू कर रहा है। यह अमर उजाला फाउंडेशन का एक प्रोजेक्ट है, जिसके तहत लेखकों को उनकी बेमिसाल कृतियों के लिए सम्मानित किया जाएगा।
हिन्दी और एक अन्य भारतीय भाषा में विशिष्ट अवदान के लिए दो सर्वोच्च अलंकरण 'आकाशदीप' दिए जाएंगे, जिसके तहत 5-5 लाख की नकद ईनाम राशि दी जाएगी। इसके अलावा तीन तरह के पुरस्कार भी दिए जाएंगे। 'थाप' के तहत हिन्दी में किसी भी लेखक की पहली पुस्तक के लिए एक लाख रुपये की सम्मान राशि दी जाएगी। 'छाप' के तहत तीन विधाओं में तीन कृतियों(कविता, कथा और गैर कथा)के लिए तीन साहित्य सम्मान दिए जाएंगे, जिसमें एक-एक लाख रुपये की सम्मान राशि होगी।
'भाषा बंधु' के तहत भारतीय भाषाओं में अनुवाद के लिए एक लाख रुपये का विशेष सम्मान दिया जाएगा। पुरस्कार पाने के इच्छुक लेखकों को 10 मई 2018 तक नियमों व शर्तों सहित प्रस्ताव पत्र भेजने होंगे। अमर उजाला फाउंडेशन द्वारा गठित निर्णायक मंडल सम्मान देने के लिए कृतियों का चयन करेगा। संबंधित पूरी जानकारी shabadsamman.amarujala.com पर उपलब्ध है। ज्यादा जानकारी के लिए पोस्टर भी देखा जा सकता है, जिसका विमोचन मंगलवार को पद्मश्री डॉ. सुरजीत पातर ने किया।
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हिन्दी और एक अन्य भारतीय भाषा में विशिष्ट अवदान के लिए दो सर्वोच्च अलंकरण 'आकाशदीप' दिए जाएंगे, जिसके तहत 5-5 लाख की नकद ईनाम राशि दी जाएगी। इसके अलावा तीन तरह के पुरस्कार भी दिए जाएंगे। 'थाप' के तहत हिन्दी में किसी भी लेखक की पहली पुस्तक के लिए एक लाख रुपये की सम्मान राशि दी जाएगी। 'छाप' के तहत तीन विधाओं में तीन कृतियों(कविता, कथा और गैर कथा)के लिए तीन साहित्य सम्मान दिए जाएंगे, जिसमें एक-एक लाख रुपये की सम्मान राशि होगी।
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'भाषा बंधु' के तहत भारतीय भाषाओं में अनुवाद के लिए एक लाख रुपये का विशेष सम्मान दिया जाएगा। पुरस्कार पाने के इच्छुक लेखकों को 10 मई 2018 तक नियमों व शर्तों सहित प्रस्ताव पत्र भेजने होंगे। अमर उजाला फाउंडेशन द्वारा गठित निर्णायक मंडल सम्मान देने के लिए कृतियों का चयन करेगा। संबंधित पूरी जानकारी shabadsamman.amarujala.com पर उपलब्ध है। ज्यादा जानकारी के लिए पोस्टर भी देखा जा सकता है, जिसका विमोचन मंगलवार को पद्मश्री डॉ. सुरजीत पातर ने किया।
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सुरजीत पात्तर ने पहल को सराहा
अमर उजाला का 'शब्द सम्मान'
अमर उजाला शब्द सम्मान के पोस्टर का विमोचन करते हुए पद्मश्री डॉ. सुरजीत पातर ने कहा कि समाज से सरोकार गढ़ते शब्द..नई कविता में उम्मीदों की हरी पत्तियां और सदियों पर पुल बनाती भाषा। साहित्य की जितनी परतें खोली जाएं, आप एक से दूसरे बिलकुल नए और ताजे समुद्र में उतर जाते हो। शब्द एक बर्ताव है, जो हमेशा हैरान करता रहा है। मान लो, एक शब्द बोलते हैं बारिश..अचानक आपके जेहन में हजारों पानी की बूंदें उतर आती हैं।
एक अजीब सा अहसास आपको चकित कर देता है। शब्द जादू की तरह है, जो हैरान करता है। शब्द गैरहाजिर को हाजिर कर सकता है। मानो मैं कहता हूं..पेड़ दौड़ रहे थे। अब अगर इसे साहित्य या कला की किसी और विधा में दिखाना हो तो कई तरीके अपनाने पड़ेंगे, लेकिन शब्द यहां पेड़ दौड़ रहे थे कहते ही जेहन में चित्र बना देंगे कि पेड़ कैसे दौड़ रहे थे। दरअसल शब्द ही सभ्यता है। इसी पर संस्कृति टिकी हुई है। हमारा मन भी शब्दों से ही बना है। कुछ भी अच्छा-बुरा जब अंदर महसूस होता है तो शब्द कंपन करते हैं।
इसी लिए कहता हूं कि शब्द..शब्द बनने से पहले कंपन था..महज एक थरथराहट था। वही आगे चलकर कविता का रूप ले लेता है। इस शब्द से वजूद का बहुत गहरा संबंध है। मैंने कभी लिखा था..मेरे अंदर वी चलदी है गुफ्तगू..जित्थे शब्दां च ढलदा है मेरा लहू...जित्थे मेरी बहस है मेरे नाल ही..। जब भी कहीं हम थिरकते हैं या डांवांडोल होते हैं तो शब्द ही संभालते हैं। शब्दों से पक्का पुल कोई और चीज नहीं बना सकती। रेत मिट्टी के पुल नदियों के ऊपर बनते हैं, शब्दों के पुल सदियों के ऊपर बनते हैं।
एक अजीब सा अहसास आपको चकित कर देता है। शब्द जादू की तरह है, जो हैरान करता है। शब्द गैरहाजिर को हाजिर कर सकता है। मानो मैं कहता हूं..पेड़ दौड़ रहे थे। अब अगर इसे साहित्य या कला की किसी और विधा में दिखाना हो तो कई तरीके अपनाने पड़ेंगे, लेकिन शब्द यहां पेड़ दौड़ रहे थे कहते ही जेहन में चित्र बना देंगे कि पेड़ कैसे दौड़ रहे थे। दरअसल शब्द ही सभ्यता है। इसी पर संस्कृति टिकी हुई है। हमारा मन भी शब्दों से ही बना है। कुछ भी अच्छा-बुरा जब अंदर महसूस होता है तो शब्द कंपन करते हैं।
इसी लिए कहता हूं कि शब्द..शब्द बनने से पहले कंपन था..महज एक थरथराहट था। वही आगे चलकर कविता का रूप ले लेता है। इस शब्द से वजूद का बहुत गहरा संबंध है। मैंने कभी लिखा था..मेरे अंदर वी चलदी है गुफ्तगू..जित्थे शब्दां च ढलदा है मेरा लहू...जित्थे मेरी बहस है मेरे नाल ही..। जब भी कहीं हम थिरकते हैं या डांवांडोल होते हैं तो शब्द ही संभालते हैं। शब्दों से पक्का पुल कोई और चीज नहीं बना सकती। रेत मिट्टी के पुल नदियों के ऊपर बनते हैं, शब्दों के पुल सदियों के ऊपर बनते हैं।
काव्य पाठ
मानो अचानक किसी ने सृष्टि से शब्द खींच लिए तो ये ऐसा होगा कि जैसे किसी के हलक से उसकी आवाज खींच लो। कोई कुछ कहने ही वाला था और उसे किसी ने गूंगा कर दिया। अचानक ब्रह़मांड बुझ जाएगा। मैं लिटरेरी कार्यक्रम के लिए चीन में था। मुझे चीनी भाषा नहीं आती थी। जब वहां कोई कविता पढ़ता तो ऐसा लगता कि जैसे मेरे चारों तरफ सिर्फ कोई आवाज गूंज रही हो। मेरे चारों तरफ अजीब से शब्द चक्कर काट रहे थे।
जब कोई उस कविता का अनुवाद कर देता तो समझ आती कि कितनी गहरी बात कही जा रही है। मैंने अपनी किताब सूरज मंदिर दीयां पौड़ियां में भी इसका जिक्र किया है। संगीत में भी शब्द से कुछ न कुछ जरूर कहना पड़ता है, नहीं तो कान बोझिल हो जाते हैं। कुदरत को कवि का मिलना तय था। हां, अगर ये मान भी लिया जाए कि कवि नहीं मिलता कुदरत को तो बहुत कुछ अनकहा रह जाता। बहुत सारे अनुभव हवा में ही लटके रह जाते। कवि किसी भी स्थिति में दोबारा लौटने की हिम्मत रखता है।
कवि वो भी महसूस करवा देता है जो अभी हुआ नहीं, या हो चुका है। कवि शब्दों में बहुत कुछ संभालता है, जख्मों के लिए मरहम बनाता है। ये भी हो सकता था कि हम देवताओं की कल्पना ही न कर पाते। धर्म की कल्पना कविता के जैसी ही है। ग्रंथों में धर्म को व्यक्त करने के लिए कविता का सहारा लिया, जो बाकी विधाओं से ज्यादा सटीक बैठा। किसी नदी को घर नहीं ला सकते, लेकिन हां, नदी पर लिखी कविता को घर ला सकते हैं। कविता सृजन करती है, जेहन में भी और बाहर भी। यही एक कवि की दौलत और जायदाद है। कवि कुदरत को बयां करने का एक मात्र माध्यम है।
जब कोई उस कविता का अनुवाद कर देता तो समझ आती कि कितनी गहरी बात कही जा रही है। मैंने अपनी किताब सूरज मंदिर दीयां पौड़ियां में भी इसका जिक्र किया है। संगीत में भी शब्द से कुछ न कुछ जरूर कहना पड़ता है, नहीं तो कान बोझिल हो जाते हैं। कुदरत को कवि का मिलना तय था। हां, अगर ये मान भी लिया जाए कि कवि नहीं मिलता कुदरत को तो बहुत कुछ अनकहा रह जाता। बहुत सारे अनुभव हवा में ही लटके रह जाते। कवि किसी भी स्थिति में दोबारा लौटने की हिम्मत रखता है।
कवि वो भी महसूस करवा देता है जो अभी हुआ नहीं, या हो चुका है। कवि शब्दों में बहुत कुछ संभालता है, जख्मों के लिए मरहम बनाता है। ये भी हो सकता था कि हम देवताओं की कल्पना ही न कर पाते। धर्म की कल्पना कविता के जैसी ही है। ग्रंथों में धर्म को व्यक्त करने के लिए कविता का सहारा लिया, जो बाकी विधाओं से ज्यादा सटीक बैठा। किसी नदी को घर नहीं ला सकते, लेकिन हां, नदी पर लिखी कविता को घर ला सकते हैं। कविता सृजन करती है, जेहन में भी और बाहर भी। यही एक कवि की दौलत और जायदाद है। कवि कुदरत को बयां करने का एक मात्र माध्यम है।
विश्व काव्य
जो कविता लिख नहीं सकता वो मेरी नजर में महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ पाठक है। ये वो पाठक है जो वाह, कमाल शब्दों के सहारे अपना अनुभव बयां करता है। उसे लगता है कि जो कहा गया है कविता में, वो उसके ज्यादा करीब है, या सिर्फ उसके लिए ही कहा गया है। वो अनुभव तो कर सकता है, लेकिन उसे हूबहू शब्दों में ढाल नहीं सकता। वो उसे उतनी ही शिद्दत से महसूस करता है, जितनी शिद्दत से लिखा गया है। ये तीसरा किरदार कविता के लिए अहम है। नया साहित्य बहुत लिखा जा रहा है। साहित्य जो आपके अनुभव से निकले, वही टिकता है।
इसका कोई एक मानक नहीं है। जो कविता धरातल पर बैठकर लिखी गई, वो जल्दी दिमाग से फेड हो जाएगी। जब कवि क्रिएशन नहीं, सिर्फ प्रोडक्शन करता है, तब कविता दिमाग में उतरने की बजाय दिमाग से उतर जाती है। ऐसी कविता समाज या खुद से कोई सरोकार नहीं गढ़ पाती। नए साहित्य में कहीं-कहीं समाज से सरोकार की झलक मिलती है, लेकिन हवा में कहा गया कुछ भी ज्यादा देर टिक नहीं सकता। कवि जब अपने भीतर समाज को उतार कर सोचता है, तो सरोकार अपने-आप गढ़ जाता है। निजी कविता में भी समाज से सरोकार हो सकता है, बस उसे लिखते समय समाज को नजर में रखा गया होना चाहिए।
राष्ट्रीय एकता की अटूट कड़ी है भाषा
भाषा के पीछे कितनी दौलत छिपी है, इसका हमें तब तक पता नहीं चलता, जब तक भाषा का ज्ञान न हो। ये ऐसा है जैसे कि ब्लाइंड को हीरों के ऊपर से गुजरने दिया जाए। उसे पैरों के नीचे हीरे भी कंकर पत्थर या कांच के टुकड़े महसूस होंगे। भाषाओं का अनुवाद लोहे के परदे को एक तरफ करने की कला है। जब भाषा का अनुवाद होता है तो एक राष्ट्र दूसरे से मिलता है, एक साझ पैदा होती है, सरोकार जुड़ते हैं और साहित्य की बारीकियों से रूबरू होते हैं। एक तरह से अनुवाद मिलाने की ही प्रक्रिया है। मान लो हमारा चीनी लोगों के लिए नजरिया ऐसा है कि हम अच्छा नहीं समझते। जब उनका अपनी भाषा में अनुवाद किया कोई नॉवेल पढ़ते हैं, तो पता चलता है कि जो सोच रहे थे, वैसा नहीं है। किसी भी भाषा, व्यक्ति या राष्ट्र से जुड़ने के लिए अनुवाद का बेहद महत्व है।
इसका कोई एक मानक नहीं है। जो कविता धरातल पर बैठकर लिखी गई, वो जल्दी दिमाग से फेड हो जाएगी। जब कवि क्रिएशन नहीं, सिर्फ प्रोडक्शन करता है, तब कविता दिमाग में उतरने की बजाय दिमाग से उतर जाती है। ऐसी कविता समाज या खुद से कोई सरोकार नहीं गढ़ पाती। नए साहित्य में कहीं-कहीं समाज से सरोकार की झलक मिलती है, लेकिन हवा में कहा गया कुछ भी ज्यादा देर टिक नहीं सकता। कवि जब अपने भीतर समाज को उतार कर सोचता है, तो सरोकार अपने-आप गढ़ जाता है। निजी कविता में भी समाज से सरोकार हो सकता है, बस उसे लिखते समय समाज को नजर में रखा गया होना चाहिए।
राष्ट्रीय एकता की अटूट कड़ी है भाषा
भाषा के पीछे कितनी दौलत छिपी है, इसका हमें तब तक पता नहीं चलता, जब तक भाषा का ज्ञान न हो। ये ऐसा है जैसे कि ब्लाइंड को हीरों के ऊपर से गुजरने दिया जाए। उसे पैरों के नीचे हीरे भी कंकर पत्थर या कांच के टुकड़े महसूस होंगे। भाषाओं का अनुवाद लोहे के परदे को एक तरफ करने की कला है। जब भाषा का अनुवाद होता है तो एक राष्ट्र दूसरे से मिलता है, एक साझ पैदा होती है, सरोकार जुड़ते हैं और साहित्य की बारीकियों से रूबरू होते हैं। एक तरह से अनुवाद मिलाने की ही प्रक्रिया है। मान लो हमारा चीनी लोगों के लिए नजरिया ऐसा है कि हम अच्छा नहीं समझते। जब उनका अपनी भाषा में अनुवाद किया कोई नॉवेल पढ़ते हैं, तो पता चलता है कि जो सोच रहे थे, वैसा नहीं है। किसी भी भाषा, व्यक्ति या राष्ट्र से जुड़ने के लिए अनुवाद का बेहद महत्व है।
साहित्य की संभावनाएं असीम हैं
हिंदी साहित्य
दौर कोई भी हो, साहित्य में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती। पहले प्रेस नहीं थी। बहुत कुछ लिखा रह जाता था। जो अच्छा था वो भी नजर में नहीं आता था। अब प्रेस आ गई। छपना-छापना शुरू हो गया। बहुत ज्यादा लिखा जा रहा और छप रहा है। हां, पहले प्रकाशक अपनी कसौटी पर छापते थे। अब बिजनेस और पैसे खर्च करने का खेल हो गया। सभी के पास वक्त कम है और कोई अपना आलोचक भी नहीं है। अब प्रकाशक महज प्रिंटर बनकर रह गया है। धड़ाधड़ लिखे जा रहे साहित्य में अच्छी बात भी नजर में आने से चूक जाती है।
भाषा साहित्य और संस्कार की तीन अहम कड़ियां हैं। इनमें से कोई भी चीज भाषा के बिना संभव नहीं है। जरूरी तीनों ही हैं, लेकिन साहित्य भाषा से बनता है। इस लिए साहित्य कुछ ज्यादा अहम है। साहित्य में बहुत गहरी चीजें दबाई गई हैं। साहित्य एक प्रमाणक चीज है। संस्कारों के साथ-साथ भाषा को भी साहित्य जिंदा रखता है। साहित्य भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को एक साथ लेकर चलता है। साहित्य की कड़ी ज्यादा मजबूत होगी तो भाषा और संस्कार भी बचे रहेंगे।
सोशल मीडिया पर एक नई तरह की जबान पैदा हो रही है। ऐसा सवाल खड़ा होता है कि कहीं ये साहित्य का नुकसान न कर दे। हां, नुकसान तब होगा जब साहित्यकार अपना काम करना बंद कर देंगे। हर दौर में मानवता ने अपनी ही एक कोड भाषा ईजाद की है। सभ्याचार पहाड़ नहीं, दरिया है। पंजाबी में कई शब्द अरबी, फारसी और उर्दू से लिए गए हैं। ये भाषा की खूबसूरती है। समाज ने अपने तरीके से बदलना ही है। इस बदलते दरिया को रोकना संभव नहीं है।
शिव कुमार बटालवी ने लूणा को अपने महाकाव्य में बरी कर दिया, जबकि शायर कादर यार ने उसे कटघरे में खड़ा कर दिया। ऐसे ये बदलाव होते रहेंगे। साहित्य जंजीरों से मुक्ति देता है। जो भी भाषा चल रही है, जोड़ने का काम तो कर ही रही है। सोशल मीडिया से खरी चीज ढूंढो सब ठीक लगेगा। जो बचाकर रखना है, उसे ज्यादा सोचें। मानवता में बहुत कुछ है, इनसे निराश नहीं होना। साहित्य आदमी के अकेलेपन को तोड़ता है। उसकी मायूसी की भावना को कम करता है। उसे उसके जैसे आदमी मिलाता है।
भाषा साहित्य और संस्कार की तीन अहम कड़ियां हैं। इनमें से कोई भी चीज भाषा के बिना संभव नहीं है। जरूरी तीनों ही हैं, लेकिन साहित्य भाषा से बनता है। इस लिए साहित्य कुछ ज्यादा अहम है। साहित्य में बहुत गहरी चीजें दबाई गई हैं। साहित्य एक प्रमाणक चीज है। संस्कारों के साथ-साथ भाषा को भी साहित्य जिंदा रखता है। साहित्य भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को एक साथ लेकर चलता है। साहित्य की कड़ी ज्यादा मजबूत होगी तो भाषा और संस्कार भी बचे रहेंगे।
सोशल मीडिया पर एक नई तरह की जबान पैदा हो रही है। ऐसा सवाल खड़ा होता है कि कहीं ये साहित्य का नुकसान न कर दे। हां, नुकसान तब होगा जब साहित्यकार अपना काम करना बंद कर देंगे। हर दौर में मानवता ने अपनी ही एक कोड भाषा ईजाद की है। सभ्याचार पहाड़ नहीं, दरिया है। पंजाबी में कई शब्द अरबी, फारसी और उर्दू से लिए गए हैं। ये भाषा की खूबसूरती है। समाज ने अपने तरीके से बदलना ही है। इस बदलते दरिया को रोकना संभव नहीं है।
शिव कुमार बटालवी ने लूणा को अपने महाकाव्य में बरी कर दिया, जबकि शायर कादर यार ने उसे कटघरे में खड़ा कर दिया। ऐसे ये बदलाव होते रहेंगे। साहित्य जंजीरों से मुक्ति देता है। जो भी भाषा चल रही है, जोड़ने का काम तो कर ही रही है। सोशल मीडिया से खरी चीज ढूंढो सब ठीक लगेगा। जो बचाकर रखना है, उसे ज्यादा सोचें। मानवता में बहुत कुछ है, इनसे निराश नहीं होना। साहित्य आदमी के अकेलेपन को तोड़ता है। उसकी मायूसी की भावना को कम करता है। उसे उसके जैसे आदमी मिलाता है।