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अदालत का आदेश : नैतिक पतन के मामलों में बरी व्यक्ति को सशस्त्र बलों में किया जा सकता है नियुक्त

Sun, 14 Jan 2024 07:07 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़
अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 14 Jan 2024 07:07 AM IST
सार

ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त करने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी पॉक्सो एक्ट में बरी किए गए व्यक्ति को भारत तिब्बत सीमा पुलिस में कांस्टेबल के रूप में नियुक्त करने पर विचार करने का निर्देश जारी करते हुए की है।

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A person acquitted in cases of moral turpitude can be appointed in the armed forces.
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि संदेह के आधार पर नैतिक पतन के अपराधों में बरी किए व्यक्तियों को सशस्त्र बलों में नियुक्त किया जा सकता है। ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त करने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी पॉक्सो एक्ट में बरी किए गए व्यक्ति को भारत तिब्बत सीमा पुलिस में कांस्टेबल के रूप में नियुक्त करने पर विचार करने का निर्देश जारी करते हुए की है।

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कैथल निवासी दीपक कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया था कि उसे आईटीबीपी में कांस्टेबल के तौर पर नियुक्ति के लिए जारी पत्र 2022 में रद्द कर दिया गया था। याची ने बताया कि नियुक्ति पत्र रद्द करने का आधार गृह मंत्रालय (एमएचए) द्वारा 2012 में जारी निर्देशों को बनाया गया था, जिसके अनुसार आमतौर पर किसी व्यक्ति के नैतिक अपराध में बरी होने के बाद भी सशस्त्र बलों में नियुक्त नहीं किया जाता, लेकिन नियुक्ति पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। ऐसे मामलों में सक्षम प्राधिकारी उम्मीदवार के मामले पर विचार कर सकता है।
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याची ने बताया कि उसके पिता 1989 में आईटीबीपी में कांस्टेबल के रूप में शामिल हुए थे और 1996 में नौकरी के दौरान उनका निधन हो गया। 2012 में याची ने अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की मांग की थी। 2018 में याची पर दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया था लेकिन एक साल बाद उसे बरी कर दिया गया। 2022 में केंद्र सरकार ने कुमार को नियुक्ति पत्र जारी किया था। नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान याची ने आपराधिक मामले और खुद के बरी होने के बारे में खुलासा किया। खुलासे के बाद अधिकारियों ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि क्यों न उनकी नियुक्ति रद्द कर दी जाए क्योंकि उन्हें केवल संदेह के लाभ के आधार पर बरी कर दिया गया था। कुमार द्वारा जवाब दाखिल करने के बाद नियुक्ति पत्र रद्द कर दिया गया था। 
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बरी करने के फैसले के आधार को देखना जरूरी
हाईकोर्ट के समक्ष नियुक्ति रद्द करने को चुनौती देते हुए याची ने दलील दी कि पीडि़ता और उसकी मां ने अदालत में गवाही दी थी कि याची ने अपराध नहीं किया है। केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि कुमार ने गृह मंत्रालय की ओर से जारी निर्देशों को चुनौती नहीं दी है, जिसके अनुसार यदि संदेह के लाभ के आधार पर बरी कर दिया जाता है या जहां गवाह मुकर गए हैं, तो एक उम्मीदवार को आम तौर पर नियुक्ति के लिए उपयुक्त नहीं माना जाएगा। सभी पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस बंसल ने   कहा कि मामले में बरी करने के फैसले के आधार को देखना जरूरी है। 

  • कोर्ट ने कहा, यह सर्वविदित तथ्य है कि नौकरी पाना बहुत मुश्किल है, खासकर सरकारी क्षेत्र में। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को इस बात की अनदेखी करते हुए नियुक्ति से इनकार किया गया कि उसने अपनी साख का खुलासा करने में ईमानदार दिखाई। 
  • कोर्ट ने चार सप्ताह के भीतर याची की नियुक्ति पर विचार करने का केंद्र सरकार को आदेश दिया।
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