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चंडीगढ़ प्रशासन का हाल: पांच माह से आंगनबाड़ी कर्मियों को नहीं मिली पगार... सोच में कर्मी-कैसे मनाएं त्योहार

Thu, 11 Aug 2022 09:41 AM IST
निवेदिता वर्मा रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 11 Aug 2022 09:41 AM IST
सार

केंद्र सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन की कई योजनाओं को जमीनी स्तर पर लोगों और बच्चों तक पहुंचाने वालीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व हेल्पर कई वजहों की वजह से इन दिनों मानसिक तौर पर बेहद परेशान हैं। सबसे बड़ी वजह मानदेय का समय पर नहीं मिलना है।

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900 Anganwadi workers and helpers of Chandigarh not received salaries for last five months
आंगनबाड़ी कर्मियों को नहीं मिला वेतन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चंडीगढ़ के 450 आंगनबाड़ी केंद्रों की 900 आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और हेल्परों को पिछले पांच महीने से वेतन नहीं मिला है। आज रक्षाबंधन का त्योहार है, ऐसे में वे सभी बेहद परेशान हैं। किसी के घर में राशन की समस्या है, तो किसी को गैस भरवानी है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि खाली पेट वे आजादी का अमृत महोत्सव कैसे मनाएं।

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केंद्र सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन की कई योजनाओं को जमीनी स्तर पर लोगों और बच्चों तक पहुंचाने वालीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व हेल्पर कई वजहों की वजह से इन दिनों मानसिक तौर पर बेहद परेशान हैं। सबसे बड़ी वजह मानदेय का समय पर नहीं मिलना है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं व हेल्परों को केंद्र और प्रशासन की ओर से मानदेय जारी होता है। इनमें से कार्यकर्ताओं को 3600 रुपये प्रशासन और 4500 रुपये केंद्र और हेल्परों को 1800 रुपये प्रशासन और 2500 रुपये केंद्र सरकार से मिलते हैं, लेकिन पांच महीने से केंद्र की ओर से मिलने वाली राशि कार्यकर्ताओं व हेल्परों को नहीं मिली है। प्रशासन की राशि मिली है, लेकिन 3600 रुपये में कार्यकर्ताएं और 1800 रुपये में हेल्पर पूरे महीने का गुजारा कैसे चलाएं। हेल्परों का कहना है कि 1800 रुपये में विभाग के अधिकारी महीने भर खर्च चलाने को बोलते हैं। ये कैसे संभव है। एक गैस सिलिंडर की भराई में ही 1100 रुपये निकल जाते हैं।
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हर घर अभियान के तहत तिरंगा रैली निकालने की जिम्मेदारी भी मिली

आंगनबाड़ी केंद्रों में एक कार्यकर्ता और एक सहायिका होती हैं। बच्चों को संभालना, उनके लिए दैनिक पौष्टिक आहार की व्यवस्था, स्कूल में दाखिले के लिए बच्चों को मानसिक व शारीरिक तौर पर तैयार करना, उनके स्वास्थ्य और स्वच्छता का ध्यान रखना, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताओं को परामर्श देना, ये सभी काम आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं द्वारा किए जाते हैं। इसके अलावा टीकाकरण, पोलियो, पोषण अभियान, दिव्यांग बच्चों की पहचान, जनसंख्या अभियान में भी इन्हीं की जिम्मेदारी लगाई जाती है। हर घर अभियान के तहत बच्चों की तिरंगा रैली निकालने की जिम्मेदारी भी दी गई है।

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पैसे न मिलने की शिकायत करने पर डराया-धमकाया जाता है

हम रोजाना सुबह 9 बजे से दोपहर तीन बजे तक काम करते हैं। इस दौरान बच्चों को संभालना, उन्हें पढ़ाना, खाना खिलाना, रजिस्टर मेंटेन करना, पोषण लड्डू बांटना, मोबाइल पर आंकड़े अपलोड करना समेत कई कार्य करते हैं। बदले में बहुत कम पैसे मिलते हैं। उसमें भी पांच महीने से हमें वो पैसे नहीं मिले। अगर शिकायत करने के लिए किसी अधिकारी के पास जाते हैं तो हमें डराया और धमकाया जाता है। - निशा (बदला हुआ नाम), आंगनबाड़ी कार्यकर्ता


खराब मोबाइल की शिकायत पर कहते हैं खुद नया खरीद लो

विभाग ने हमें करीब चार साल पहले मोबाइल दिए थे, जिसमें बच्चों की जानकारी समेत कई आंकड़े अपलोड करने व आदि का काम किया दिया था। ज्यादातर के पास मौजूद वो मोबाइल खराब हो गए हैं। जो ठीक है, वो इतना धीरे काम करते हैं कि दो मिनट के काम को करने में 10 मिनट लग जाते हैं। अधिकारियों को इसके बारे में जब बताया तो कहा कि खुद नया खरीद लो। - रेशमा (बदला हुआ नाम), आंगनबाड़ी कार्यकर्ता

सेंटर के रखरखाव से लेकर बिजली-पानी का बिल भी हम से भरवाते हैं

स्मॉल फ्लैट में कई आंगनबाड़ी सेंटर चलते हैं। यहां पानी का नल, पंखा, कुर्सी-टेबल या कुछ भी खराब या टूट जाए तो विभाग के लोग कहते हैं कि खुद ठीक करवाओ। सेंटर के रखरखाव से लेकर पानी की टंकी में लीकेज भी हो तब भी कहते हैं, खुद कराओ। हद तो ये है कि स्मॉल फ्लैट के सेंटर के बिजली और पानी का बिल भी वर्कर भरती हैं। अधिकारी कहते हैं कि बाद में वापस दे देंगे, लेकिन काफी समय से नहीं मिला। - बबीता (बदला हुआ नाम), आंगनबाड़ी कार्यकर्ता

ये रवैया अमानवीय और गैर कानूनी

आंगनबाड़ी कर्मियों के प्रति ये रवैया न सिर्फ अमानवीय है बल्कि गैर कानूनी भी है। काम करने वाले हरेक व्यक्ति को उसका वेतन महीने की सात तारीख तक देना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं होता है तो जुर्माने में 10 गुना अधिक राशि देनी होती है। कोरोना काल में भी इन कर्मियों ने अपनी जान जोखिम में डाल कर दिए गए कार्य किए लेकिन आज तक इन्हें उस के एवज में एक रुपया तक नहीं मिला। - कंवलजीत सिंह, अध्यक्ष, एक्टू

 

केंद्र से कुछ पैसा आने में देरी हुई है। हालांकि फिर भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और हेल्परों के मानदेय को रोका नहीं जा सकता। मुझे बताया गया था कि अगर केंद्र से पैसा आने में देर होती है, तो कर्मियों को स्टेट के फंड से पैसा दे दिया जाता है और जैसे ही केंद्र से पैसा आता है। उसे स्टेट के खाते में डाल दिया जाता है। अंदर पांच महीने से केंद्र का मानदेय नहीं मिला है, तो इसकी जांच कराएंगे और हमेशा के लिए इस समस्या को दूर करने का प्रयास किया जाएगा। - नितिका पवार, सचिव, समाज कल्याण विभाग

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