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1971 में पहले देश के लिए लड़ा, फिर लड़ी हक की लड़ाई, 46 साल बाद फौजी को मिलेगी पेंशन

Sat, 16 Mar 2019 12:44 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोहाली (पंजाब)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोहाली (पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Sat, 16 Mar 2019 12:44 AM IST
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1971 indo-Pak war warrior will now get pension
46 साल बाद फौजी को मिलेगी पेंशन - फोटो : अमर उजाला

ये कहानी उस फौजी की है जिसे अपने हक के लिए 46 साल का इंतजार करना पड़ा। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिर उन्हें पेंशन मिलने की राह साफ हो गई। मोहाली के रहने वाले 71 वर्षीय पूर्व फौजी बलदेव सिंह को 46 साल संघर्ष करने के बाद पेंशन मिलने की राह साफ हो पाई है। अब उन्हें 50 फीसदी डिसएबिलिटी पेंशन मिलेगी। इसके मुताबिक हर माह उन्हें 15 हजार रुपये मिलेंगे। वहीं, पांच साल का मुआवजा भी मिलेगा। यह सारी कार्रवाई चार महीने में सेना को पूरी करनी होगी। यह संभव हो गया है एक्स सर्विसमैन ग्रीवांसेज सेल के प्रधान कर्नल एसएस सोही के प्रयास से, जो कि इस मामले को आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एफटी) में लेकर गए थे। इसके बाद अदालत ने पूर्व फौजी के हक में फैसला सुनाया है।

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क्या हुआ था 45 साल पहले 

45 साल पहले, पाकिस्तानी सेना के 93,000 सदस्यों ने सफेद झंडे उठाए और 1971 के भारत-पाक युद्ध का अंत करते हुए भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।यह संघर्ष बांग्लादेश की आजादी के युद्ध का परिणाम था, जब बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) पाकिस्तान (पश्चिम) से आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। 

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बलदेव सिंह ने कैसे लड़ी दो लड़ाइयां

बलदेव सिंह गांव पजोली नजदीक खरड़ के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि 30-12-62 को बंगाल इंजीनियरिंग रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। सन 1971 की लड़ाई में उन्होंने हिस्सा लिया। जुलाई 1972 में सेना ने अनफिट घोषित करके रिटायर कर दिया। सेना अधिकारियों का कहना था कि उसका दिमाग काम नहीं कर रहा है। उस समय फौज ने वादा किया था कि उन्हें पेंशन दी जाएगी, क्योंकि उस समय इनकी सर्विस 10 साल हो चुकी थी। लेकिन इसके बाद सेना ने उनकी कोई सुध नहीं ली। 

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वह घर आकर भैंसे रखकर व खेती कर अपने परिवार को पालते रहे। उनकी दो बेटियां और एक बेटा है जिसे भी उन्हें पढ़ा लिखाकर शादियां कर दीं। इसी बीच उन्होंने संस्था से संपर्क किया। संस्था ने इस संबंध में पैरवी कर फौज से संपर्क किया। इसके बाद फौज का कहना था उनके पास उक्त फौजी का कोई रिकॉर्ड नहीं है। 

इसके बाद संस्था इस केस को आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल लेकर गई। अदालत में फौज के अधिकारियों ने कहा कि फौजी से संबंधी कोई दस्तावेज उनके पास नहीं है। इसके बाद उनकी संस्था की तरफ से फौजी से संबंधी सारे दस्तावेज जमा करवाए गए।

सेना पेंशन देने के हक में नहीं थी 

अदालत में सेना के अधिकारियों ने सवाल किया कि 46 साल बाद फौजी पेंशन का केस क्यों लड़ रहा है, इससे पहले मांग क्यों नहीं की। इस पर अदालत ने सेना को लताड़ लगाई। साथ ही कहा कि सेना को पेंशन देनी होगी और इसके साथ मुआवजा भी दिया जाए। इसके बाद अदालत ने सिपाही बलदेव सिंह को पंद्रह हजार रुपये प्रति माह पेंशन और पांच साल का मुआवजा चार महीने में देने का आदेश दिया।

एक कागज के सहारे लड़ा केस 

लेफ्टिनेंट कर्नल सोही ने कहा कि बलदेव सिंह ने इस केस को एक कागज के सहारे जीता है। सेना की दलील थी कि उनके पास दस्तावेज नहीं हैं। वहीं, हमारे पास केवल फौजी की डिस्चार्ज बुक थी, जिसको ही आधार बनाकर केस लड़ा गया। उन्होंने कहा कि पहले भी उन्होंने कई फौजियों को उनकी पेंशन दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। वहीं, यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा।

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