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एसआईआर विवाद: केंद्रीय मंत्री ने बिहार में SIR का रिकॉर्ड लाया सामने; कितने नाम क्यों हटे, कितनी आपत्तियां?
Thu, 05 Nov 2026 04:19 PM IST
आदित्य आनंद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
Published by: आदित्य आनंद
Updated Thu, 05 Nov 2026 04:19 PM IST
सार
SIR News : देशभर में विपक्ष जहां SIR के खिलाफ माहौल बनाकर वोट चोरी की बात कर रहा है, भाजपा उसका खंडन करने के लिए आंकड़ों के साथ उतर आई है। गुरुवार को केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने बिहार में मतदाताओं के विशेष गहन पुनरीक्षण का सारा रिकॉर्ड बताया।
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मतदाताओं के विशेष गहन पुनरीक्षण पर विस्तार से बात करते भूपेंद्र यादव।
- फोटो : amar ujala digital
विस्तार
'लोकतंत्र हटाओ अराजकता हटाओ' अभियान के तहत बिहार दौरे पर पहुंचे केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने पटना में प्रवेश वार्ता की। उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण पर बात की। कुछ आंकड़े साझा किए और विपक्ष पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि जब हम कहते हैं कि भारत लोकतंत्र की जननी है, तो हमारी लोकतांत्रिक विरासत की श्रृंखला बिहार के गणतंत्रों से जुड़ी हुई है। भारत में लोकतंत्र की परंपरा बहुत पुरानी रही है। यहां न्याय और संवाद के माध्यम से बड़े-बड़े विषयों पर समाधान निकालने की परंपरा रही है।
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जब कांग्रेस ने देश में आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को खतरे में डालने का प्रयास किया, तब भी लोकतंत्र को बचाने की उम्मीद, संकल्प और उसके क्रियान्वयन की शुरुआत जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार से ही हुई थी। इसलिए मेरा दृढ़ विश्वास है कि लोकतंत्र की चर्चा, लोकतंत्र की संकल्पना और लोकतांत्रिक मूल्यों को जीवन में अपनाने के मामले में बिहार की धरती हमेशा प्रेरणादायी रही है। मुझे भी यहां काम करने के दौरान इन सभी चीजों को सीखने का अवसर मिला। इसके लिए मैं बिहार की जनता और इस धरती का आभार व्यक्त करता हूं।
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एसआईआर कोई नई प्रक्रिया नहीं, पहले भी आठ बार हो चुकी है
भूपेंद्र यादव ने कहा कि आजकल एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, मानो यह पहली बार हो रहा हो। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21 सहित अन्य प्रावधानों में निर्वाचन आयोग को समय-समय पर मतदाता सूची का पुनरीक्षण करने का अधिकार दिया गया है।मतदाता सूची का पुनरीक्षण दो तरह से होता है। एक सामान्य पुनरीक्षण होता है, जो चुनाव से पहले किया जाता है। इसके अलावा नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए साल में चार बार निर्धारित तिथियों पर अवसर दिया जाता है। विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और त्रुटिरहित बनाना है। इसमें जिन मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी है, उनके नाम हटाए जाते हैं। जो लोग स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित हो गए हैं, उनके नामों का सत्यापन किया जाता है। जिन मतदाताओं के नाम दो जगह दर्ज हैं, ऐसे दोहरे नामों को ठीक किया जाता है। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि कोई पात्र मतदाता मताधिकार से वंचित न रहे। चुनाव की पवित्रता मतदाता सूची की शुद्धता पर ही निर्भर करती है।
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भूपेंद्र यादव ने कहा कि एसआईआर पहली बार नहीं हो रही है। वर्ष 1950 से 2024 तक यह आठ बार हो चुकी है। इनमें 1952, 1957, 1965, 1967, 1983, 1987, 1992 और 2002 शामिल हैं। वर्ष 2002 में शुरू हुई प्रक्रिया एनडीए सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी, लेकिन यूपीए के कार्यकाल में पूरी हुई। उस समय किसी राजनीतिक दल ने इसका विरोध नहीं किया था। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इस पर सवाल उठाने वालों का उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूत करना नहीं, बल्कि अराजकता फैलाना है। इसी कारण हमने 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' अभियान शुरू किया है।
बिहार में एसआईआर के दौरान क्या हुआ?
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एसआईआर की प्रक्रिया बूथ स्तर पर पूरी की जाती है। इसमें दो तरह के प्रतिनिधियों की भूमिका होती है। पहला, बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर, जिसे निर्वाचन आयोग नियुक्त करता है। दूसरा, बीएलए यानी बूथ लेवल एजेंट, जिसे राजनीतिक दल नियुक्त करते हैं। बीएलओ घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करते हैं। इसके लिए तीन बार घरों पर जाने की व्यवस्था की गई थी। इसके बाद मतदाता सूची का प्रारूप तैयार किया गया और राजनीतिक दलों के बीएलए को भी उपलब्ध कराया गया। बिहार में उस समय लगभग 7.89 करोड़ मतदाता थे। घर-घर सत्यापन के दौरान 22 लाख मतदाता मृत पाए गए। 36 लाख लोग स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित पाए गए। सात लाख मतदाताओं के नाम दो जगह दर्ज पाए गए। वहीं, 21 लाख 33 हजार नए मतदाता सूची में शामिल किए गए।
1.60 लाख बीएलए के बावजूद केवल दो आपत्तियां
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जब बिहार में एसआईआर से संबंधित मामला सर्वोच्च न्यायालय में सुना गया, तब न्यायालय ने सभी 12 राजनीतिक दलों को भी पक्षकार बनाया था।राजनीतिक दलों की ओर से कुल मिलाकर लगभग 1,60,813 बीएलए नियुक्त किए गए थे। इनमें राष्ट्रीय जनता दल के लगभग 35 हजार, कांग्रेस के करीब 17 हजार और अन्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी शामिल थे।सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इस बात पर आश्चर्य जताया कि 1,60,813 बीएलए नियुक्त किए जाने के बावजूद केवल दो आपत्तियां दर्ज कराई गईं। न्यायालय के फैसले में भी इसका उल्लेख है। इतने बड़े स्तर पर एसआईआर की प्रक्रिया चली, लेकिन राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट की ओर से केवल दो आपत्तियां दर्ज कराई गईं। इसके बावजूद कुछ राजनीतिक दल लगातार एसआईआर को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यह उनके दोहरे चरित्र को दर्शाता है।
विपक्ष के थिंक टैंक पर साधा निशाना
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या यह है कि आज उनके थिंक टैंक में एक्सट्रीम लेफ्ट विचारधारा के लोग प्रभावी हो गए हैं। राजद और कांग्रेस के थिंक टैंक में ऐसे लोगों का प्रभाव है, जो एक्सट्रीम लेफ्ट विचारधारा से जुड़े हैं। समाजवादी पार्टी में भी ऐसे लोगों का प्रभाव दिखाई देता है। इनका प्रभाव इतना बढ़ गया है कि राहुल गांधी जब रैली करते हैं तो अपने मुख्यमंत्रियों को भी पीछे कर देते हैं, ताकि इन लोगों का चेहरा सामने आ सके। यही लोग प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहते हैं कि रिजीम चेंज होना चाहिए। इनकी राजनीति लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर करने का प्रयास कर रही है।
कांग्रेस से 89 लाख नाम काटे जाने के आरोप पर सवाल
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कांग्रेस की ओर से बिहार में मतदाता सूची से 89 लाख लोगों के नाम काटे जाने का आरोप लगाया गया था। मैंने 31 अगस्त 2025 की बिहार निर्वाचन आयोग की प्रेस विज्ञप्ति का भी उल्लेख किया है। कांग्रेस ने जो आरोप लगाए, उनके समर्थन में आज तक ठोस तथ्य सामने नहीं रखे गए हैं। अगर किसी राजनीतिक दल को लगता है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी हुई है तो उसे प्रमाण के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। केवल आरोप लगाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करना उचित नहीं है।
चार राज्यों के चुनाव और विपक्ष के दोहरे मापदंड
एसआईआर के बाद चार राज्यों में चुनाव हुए। इनमें पश्चिम बंगाल, बिहार, तमिलनाडु और केरल शामिल हैं। केरल में विपक्षी गठबंधन को जीत मिली तो उसे लोकतंत्र की जीत बताया गया। तमिलनाडु में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। वहां गठबंधन की राजनीति पर भी सवाल खड़े हुए। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष का गठबंधन अवसरवादी है। जिन दलों के साथ वे लंबे समय तक रहे, उन्हें छोड़ने में भी देर नहीं लगाई। पश्चिम बंगाल में भी एसआईआर को लेकर विपक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। वहां न्यायालय ने प्रक्रिया की न्यायिक निगरानी की व्यवस्था की और दूसरे राज्य के न्यायिक अधिकारियों को भी लगाया गया। चुनाव से पहले राहुल गांधी ने कहा था कि ममता बनर्जी के कारण पश्चिम बंगाल में भाजपा की स्थिति मजबूत हो रही है। अब वही लोग अलग-अलग तरह के बयान दे रहे हैं। यह विपक्ष के दोहरे मापदंड को दर्शाता है। इससे स्पष्ट होता है कि एसआईआर के मुद्दे पर उनकी मंशा लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की नहीं है।