Karpuri Thakur: क्यों जन नायक कहलाए जाते हैं कर्पूरी ठाकुर; उनके बारे में जानें सब कुछ
Jan Nayak Karpuri Thakur: केंद्र सरकार ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न (मरणोपरांत) देने का एलान कर दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर जन नायक क्यों कहलाए जाने लगे। पढ़ें पूरी खबर...।
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केंद्र सरकार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न (मरणोपरांत) से सम्मानित करने का एलान किया है। यह एलान ठीक उनकी जयंती 24 जनवरी से पहले ही किया गया है। वह पिछड़े वर्गों के हितों की वकालत करने के लिए जाने जाते थे। कर्पूरी ठाकुर का वाणी पर कठोर नियंत्रण था, वे भाषा के भी कुशल कारीगर थे। उनका भाषण आडंबर-रहित, ओजस्वी, उत्साहवर्धक और चिंतनपरक होता था। कड़वा से कड़वा सच बोलने के लिए वे इस तरह के शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करते थे, जिसे सुनकर प्रतिपक्ष तिलमिला तो उठता था। लेकिन वह यह आरोप नहीं लगा पाता था कि कर्पूरी ठाकुर ने उसका अपमान किया है।
संवेदनशील व्यक्तित्व के थे कर्पूरी ठाकुर
बताया जाता है कि कर्पूरी ठाकुर की आवाज बहुत ही खनकदार और चुनौतीपूर्ण होती थी। लेकिन यह उसी हद तक सत्य, संयम और संवेदना से भी भरपूर होती थी। पूर्व मुख्यमंत्री ठाकुर को जब कोई गुमराह करने की कोशिश करता था तो वे जोर से झल्ला उठते थे, गुस्से से उनका चेहरा लाल हो उठता था। ऐसे मौकों पर वे कम ही बोल पाते थे, लेकिन बाकी सब उनकी आंखें कह देती थीं। फिर भी बिल्कुल विपरीत परिस्थितियों में भी शिष्टाचार और मर्यादा की लक्ष्मण रेखाओं का उन्होंने कभी भी उल्लंघन नहीं किया।
राजनीति में गुटबाजी और बुराइयों को हटाने आगे आए
आजादी मिलने के साथ ही कांग्रेस सत्ता में आ गई। बिहार में उस समय कांग्रेस पर ऊंची जातियों का कब्जा था। ये ऊंची जातियां सत्ता में बने रहने के लिए आपस में लड़ने लगीं। पार्टी के बजाय इन जातियों के नाम पर वोट बैंक बनने लगे। सन 1952 के प्रथम आम चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर की कुछ संख्या बहुल पिछड़ी जातियों ने भी अलग से एक गुट बना डाला, जिसका नाम रखा गया ‘त्रिवेणी संघ’। कुछ समय बाद त्रिवेणी संघ भी ढर्रे पर चला गया।
इस तरह जल्द ही इसके बुरे नतीजे सामने आने लगे। संख्याबल, बाहुबल और धनबल ही राजनीति और समाज को नियंत्रित करने लगा। राजनीतिक दलों का स्वरूप इनके मुताबिक बदलने लगा। निष्ठावान कार्यकर्ता औंधे मुंह गिरने लगे। ऐसी परिस्थिति में कर्पूरी ठाकुर ने न केवल इस परिस्थिति का डटकर सामना किया, बल्कि इन प्रवृत्तियों को प्रखर तरीके से उजागर भी किया। उस समय देश भर में कांग्रेस पार्टी में और भी कई तरह की बुराइयां पैदा हो चुकी थीं। इसलिए उसे सत्ता से हटाने के लिए सन 1967 के आम चुनाव में डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया गया।
नौकरियों में आरक्षण की मांग को उठाया यह कदम
कांग्रेस की हार के बाद बिहार में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। सत्ता में आम लोगों और पिछड़ों की भागीदारी बढ़ी। कर्पूरी उस सरकार में उप मुख्यमंत्री बने। उनका कद ऊंचा हो गया, उसे तब और ऊंचाई मिली जब वे 1977 में जनता पार्टी की विजय के बाद बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।
दरअसल, 1977 के चुनाव में पहली बार राजनीतिक सत्ता पर पिछड़े वर्ग को निर्णायक बढ़त हासिल हुई थी। लेकिन प्रशासन-तंत्र पर उनका नियंत्रण नहीं था। इसलिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग जोर-शोर से की जाने लगी। कर्पूरी ठाकुर ने मुख्यमंत्री की हैसियत से उक्त मांग को संविधान सम्मत मानकर एक फॉर्मूला निर्धारित किया और काफी विचार-विमर्श के बाद उसे लागू भी कर दिया। इस पर पक्ष और विपक्ष द्वारा विरोध जताया गया। अलग-अलग समूहों ने एक-दूसरे पर जातिवादी होने के आरोप भी लगाए। लेकिन कर्पूरी ठाकुर का व्यक्तित्व निरापद रहा। उनका कद और भी ऊंचा हो गया। इस तरह अपनी नीति और नीयत की वजह से वे सर्वसमाज के नेता यानी जन नायक बन गए।