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Jupiter In Astrology: ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति का महत्व
सार
ज्योतिष में गुरु ग्रह को देवगुरु बृहस्पति के नाम से भी जाना जाता है। गुरु ग्रह को दो राशियां को स्वामित्व प्राप्त है। गुरु संतान, विवाह, धन, शिक्षा, धर्म, करियर आदि के कारक ग्रह माने गए हैं।
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वैदिक ज्योतिष में गुरु ग्रह
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Jupiter In Astrology: वैदिक ज्योतिष शास्त्र में गुरु ग्रह का विशेष स्थान होता है। गुरु को ज्योतिष में शुभ, मंगलकारी और सौम्य ग्रह का दर्जा मिला है। इसके अलावा ज्योतिष में गुरु ग्रह को देवगुरु बृहस्पति के नाम से भी जाना जाता है। गुरु ग्रह को दो राशियां को स्वामित्व प्राप्त है। गुरु संतान, विवाह, धन, शिक्षा, धर्म, करियर आदि के कारक ग्रह माने गए हैं। जिन जातकों की कुंडली में गुरु ग्रह बली होते हैं, अच्छे भाव में होते हैं और शुभ ग्रहों से संबंध रहता है तो ऐसा जातक अपने जीवन में खूब तरक्की, मान-सम्मान और वैभव हासिल करने में कामयाब होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मनुष्य के जीवन पर गुरु का कैसा प्रभाव होता है और क्या महत्व है इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करते हैं।
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- - वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु का दर्जा प्राप्त है।
- - गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं।
- - कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जबकि मकर राशि में गुरु नीच के होते हैं।
- - गुरु बृहस्पति को तीन विशेष द्दष्टियां प्राप्त है। पांचवी, सातवीं और नौवीं द्दष्टि।
- - वैदिक ज्योतिष में गुरु बड़े भाई, शिक्षा, धन, संतान, ज्ञान और शिक्षा के कारक होते हैं।
- - गुरु बृहस्पति पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी होते हैं।
- - जिन जातकों की कुंडली के पहले भाव यानी लग्न में गुरु स्वयं बैठ जाएं तो व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली और ज्ञानी होता है।
- - कालपुरुष की कुंडली में गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और यह दूसरे, पांचवें, नौवें,दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते है।
- - गुरु के दूसरे भाव में यानी धन के भाव में होने पर जातक बहुत धनी और समृद्धिशाली रहता है।
- -जब गुरु कुंडली के पांचवें भाव में होते हैं या फिर पाचवें भाव पर द्दष्टि डालते हैं तो जातक को उच्च शिक्षा और गुणी संतान की प्राप्ति होती है।
- - नवम भाव में गुरु के होने पर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान में परांगत होता है। कुंडली का दशम भाव कार्यक्षेत्र, करियर या पेशे का होता है दशम में गुरु हो तो व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है।
- - ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का होता है। गुरु के इस भाव में होने पर जातक बहुत धन अर्जित करने में कामयाब होता है।
- - गुरु के कमजोर होने पर जातक को लीवर, किडनी, मधुमेह, पीलिया, मोटापा और कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है।
- - गुरु का रत्न पुखराज होता है। केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु पीले रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
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