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Astrology: ग्रह कब शुभ और कब अशुभ फल देते हैं, जानिए ज्योतिष शास्त्र के 10 नियम
सार
ज्योतिष में सभी 9 ग्रहों का विशेष महत्व होता है। कुंडली में इन 9 ग्रहों की स्थिति ही व्यक्ति के जीवन को सफल या असफल बनाने का कार्य करते हैं।
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कुंडली में ग्रहों का महत्व
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
ज्योतिषीय गणनाओं का आधार कुंडली के 12 भाव, 12 राशियां, 27 नक्षत्र और 9 ग्रहों के आपसी संबंधों और इनके गहन विश्लेषण पर टिका हुआ होता है। किसी जातक की कुंडली का अध्ययन करके उसके जीवन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातों के बारे में पता लगाया जा सकता है। ज्योतिष में सभी 9 ग्रहों का विशेष महत्व होता है। कुंडली में इन 9 ग्रहों की स्थिति ही व्यक्ति के जीवन को सफल या असफल बनाने का कार्य करते हैं। अगर किसी जातक की कुंडली में ग्रहों की स्थिति अच्छी है तो जातक अपने जीवन में हर प्रकार के सुखों का भोग करता है वहीं अगर कुंडली में ग्रह कमजोर है तो जातक के जीवन में तरह-तरह की परेशानियां आती हैं। आइए जानते हैं ग्रहों के शुभ-अशुभ फल देने के कुछ ज्योतिषीय नियमों के बारे में...
1- जब किसी कुंडली में मौजूद ग्रह अपनी उच्च राशि, अपनी स्वयं की राशि या अपने मित्र ग्रह की राशि में होते हैं तो यह जातक को शुभ फल देने का काम करते हैं। लेकिन यह ग्रह जब अपनी नीच राशि या अपने शत्रु की राशि में होते हैं तो अशुभ फल देते हैं।
2- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रह कुंडली में अगर अपनी राशि पर द्दष्टि रखते हैं तो जिस भाव में वह राशि होती है उस भाव के लिए शुभ फल देते हैं।
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3- जब कोई ग्रह अपने मित्र ग्रहों के साथ होते हैं या फिर मित्र ग्रह एक भाव आगे और एक भाव पीछे बैठते हैं ग्रह शुभ फल प्रदान करते हैं।
4- कोई ग्रह तब अपना शुभ फल प्रदान करते हैं जब कोई ग्रह अपनी नीच राशि से उच्च राशि की तरफ भ्रमण करें और वह ग्रह अपनी वक्री अवस्था में न हो तो ग्रह अच्छा फल देने का काम करते हैं।
5- कुंडली में जो ग्रह त्रिकोण के स्वामी होते हैं और लग्नेश के मित्र होते हैं तो वह हमेशा शुभ फल प्रदान करते हैं।
6- ज्योतिषीय नियम के मुताबिक क्रूर भावों (3,6,11) के स्वामी ग्रह अशुभ फल प्रदान करते हैं.वहीं उपाच्य भावों में ग्रह के कारकत्व में वृद्धि करते हैं।
7- अशुभ भावों (6,8,12) में ग्रहों के विराजमान होने पर जातक को अशुभ फल मिलते हैं। जब ग्रह केंद्र भाव (1,4,7,10) में होते हैं शुभ फल देते हैं। वहीं दूसरी तरफ पापी ग्रह अगर केंद्र में होते हैं तो अशुभ फल देते हैं।
8- कुंडली में चंद्रमा का शुभ होना बहुत अच्छा माना जाता है। कुंडली में चंद्रमा जहां होता है उसकी अगली और पिछली राशि में जितने ज्यादा ग्रह होते हैं चंद्रमा उतना ही शुभ होता है।
9- सूर्य सभी ग्रहों का केंद्र स्थान होता है। सूर्य के निकट आने पर ग्रह अस्त हो जाते हैं और शुभ फल नहीं देते हैं।
10- बुध ग्रह को तटस्थ ग्रह माना गया है। बुध, राहु-केतु जिस भी ग्रह के साथ होते हैं उसी के अनुसार ही फल देने का काम करते हैं।
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1- जब किसी कुंडली में मौजूद ग्रह अपनी उच्च राशि, अपनी स्वयं की राशि या अपने मित्र ग्रह की राशि में होते हैं तो यह जातक को शुभ फल देने का काम करते हैं। लेकिन यह ग्रह जब अपनी नीच राशि या अपने शत्रु की राशि में होते हैं तो अशुभ फल देते हैं।
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2- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रह कुंडली में अगर अपनी राशि पर द्दष्टि रखते हैं तो जिस भाव में वह राशि होती है उस भाव के लिए शुभ फल देते हैं।
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3- जब कोई ग्रह अपने मित्र ग्रहों के साथ होते हैं या फिर मित्र ग्रह एक भाव आगे और एक भाव पीछे बैठते हैं ग्रह शुभ फल प्रदान करते हैं।
4- कोई ग्रह तब अपना शुभ फल प्रदान करते हैं जब कोई ग्रह अपनी नीच राशि से उच्च राशि की तरफ भ्रमण करें और वह ग्रह अपनी वक्री अवस्था में न हो तो ग्रह अच्छा फल देने का काम करते हैं।
5- कुंडली में जो ग्रह त्रिकोण के स्वामी होते हैं और लग्नेश के मित्र होते हैं तो वह हमेशा शुभ फल प्रदान करते हैं।
6- ज्योतिषीय नियम के मुताबिक क्रूर भावों (3,6,11) के स्वामी ग्रह अशुभ फल प्रदान करते हैं.वहीं उपाच्य भावों में ग्रह के कारकत्व में वृद्धि करते हैं।
7- अशुभ भावों (6,8,12) में ग्रहों के विराजमान होने पर जातक को अशुभ फल मिलते हैं। जब ग्रह केंद्र भाव (1,4,7,10) में होते हैं शुभ फल देते हैं। वहीं दूसरी तरफ पापी ग्रह अगर केंद्र में होते हैं तो अशुभ फल देते हैं।
8- कुंडली में चंद्रमा का शुभ होना बहुत अच्छा माना जाता है। कुंडली में चंद्रमा जहां होता है उसकी अगली और पिछली राशि में जितने ज्यादा ग्रह होते हैं चंद्रमा उतना ही शुभ होता है।
9- सूर्य सभी ग्रहों का केंद्र स्थान होता है। सूर्य के निकट आने पर ग्रह अस्त हो जाते हैं और शुभ फल नहीं देते हैं।
10- बुध ग्रह को तटस्थ ग्रह माना गया है। बुध, राहु-केतु जिस भी ग्रह के साथ होते हैं उसी के अनुसार ही फल देने का काम करते हैं।
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