मनुष्य ग्रहों से नियत्रित है। इनमें शनि विशेष प्रभावशाली ग्रह हैं। इसका पृथ्वी के वातावरण और जन जीवन की घटनाओं पर सीधा असर पड़ता है। शनि के विषय में ऐसी बातें प्रचारित हो गयी हैं कि शनि को लोग बुरा ही बुरा मानते है।
शनि डर व भय का प्रतीक बन गया है। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल विपरीत है। शनि सूर्य के पुत्र हैं और छाया इनकी माता हैं। शनि को विधाता ने प्रकृति का संतुलन बनाये रखने के लिए न्याय का कार्य सौंपा है। शनि दंड के देवता है।
अनुभव और अनुसंधानों से हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि शनि किसी भी प्रकार से खराब नहीं। इसकी राशियां कर्म और लाभ को प्रतिपादित करती हैं। शनिवार के दिन अमावस्या होने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
इस दिन शनिदेव की महादशा, अन्तरदशा या साढ़ेसाती से पीड़ित व्यक्तियों को शनिदेव की विशेष कृपा प्राप्ति हेतु पीपल के नीचे शनिदेव जी की पूजा अर्चना और परिक्रमा करनी चाहिए।
व्रतों, उपवासों, नियमों से पापकर्मों और दुखों से छुटकारा मिलता है, शारीरिक और मानसिक शुद्धि होती है। इससे इन्द्रियों को वश में करके, पाप व तापों से निवृत्ति के लिए शास्त्रों मे बड़ी सरल व्यवस्था दी है। यह शुचिता- पवित्रता त्याग तप की प्रेरणा का स्रोत हैं।