भगवान शिव को रूद्राक्ष बहुत प्रिय है इसलिए अपने गले में एवं शरीर के अन्य अंगों में रूद्राक्ष धारण करते हैं। पुराणों के अनुसार रूद्राक्ष धारण करने वाला भक्त भी भगवान शिव को प्रिय होता है। भगवान शिव अपने ऐसे भक्तों को संकट से पार निकलने की क्षमता प्रदान करते हैं। मुख के आधार पर रूद्राक्ष 14 प्रकार के होते हैं।
इसके अलावा एक रूद्राक्ष ऐसा भी होता है जिसमें आपस में दो रूद्राक्ष मिले होते हैं इसे गौरी शंकर रूद्राक्ष के नाम से जाना जाता है। जिस रूद्राक्ष में सूढ़ निकला होता है उसे गणेश रूद्राक्ष कहा जाता है। मुख के आधार पर रूद्राक्ष की अलग-अलग खूबियां हैं। माना जाता है कि सात मुख वाला रूद्राक्ष शनि द्वारा शासित होता है। यह नीलम के समान लाभ देता है। इसे धारण करने से शनि के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।
जबकि आध्यात्मिक विषयों के जानकार और जाने माने ज्योतिषाचार्य 'पण्डित जयगोविंद शास्त्री' कहते हैं कि सप्तमुखी रूद्राक्ष का शनि के साथ कोई संबंध नहीं है। यह अलग बात है कि यह रूद्राक्ष गृहस्थों के लिए उत्तम होता है। इनके अनुसार यजुर्वेद में कहा गया है कि, जो फल गन्ने के रस से रूद्राभिषेक करने से प्राप्त होता है वही फल सप्तमुखी रूद्राक्ष धारण करने से प्राप्त होता है।
जिन लोगों की आर्थिक स्थिति दिन प्रतिदिन खराब होती जा रही है। सामाजिक मान-प्रतिष्ठा की हानि हो रही है उन्हें सप्तमुखी रूद्राक्ष धारण करने से लाभ मिलता है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से वैवाहिक जीवन की परेशानियां एवं विवाह में आ रही बाधाएं भी दूर हो जाती है।
जो लोग शनि दोष की शांति के उद्देश्य से इस रूद्राक्ष को धारण करना चाह रहे हैं उन्हें इस भ्रम को मन से निकाल देना चाहिए कि यह आपको शनि के कुप्रभाव से मुक्ति दिलाएगा। आपके जैसे कर्म होंगे उसी अनुरूप शनि अपनी दशा के दौरान आपको फल देगा।
अगर आप आर्थिक उन्नति और समृद्धि के उद्देश्य से इसे धारण करें तो आपको इसका अवश्य लाभ मिल सकता है। शास्त्रों के अनुसार रूद्राभिषेक करने से जो पुण्य फल प्राप्त होता है वही पुण्य सप्तमुखी
रूद्राक्ष धारण करने से प्राप्त होता है।