उत्तकाशी रवांई घाटी के रामा सिरांई, कमल सिरांई क्षेत्र के खलाड़ी, करड़ा, नेत्री जनजाति गांव ढ़काड़ा, कूफारा, स्वील, चन्देली, कुमोला सहित क्षेत्र के दर्जनों गांवों में मंगसीर बग्वाल बड़ी धूमधाम से मनाई गई। पवित्र होला जलाकर ग्रामीणों ने रातभर वाद्ययंत्रों की थाप पर नृत्य किया। खलाड़ी के स्याणा सरदार सिंह, करड़ा के जगमोहन सिंह, राजेंद्र शर्मा, उपेंद्र शर्मा, सोवेंद्र सिंह, उपेंद्र, अमीन, हकूमत सिंह आदि का कहना है कि मंगसीर बग्वाल में रविवार को दूसरे दिन बड़ी बग्वाल के उपलक्ष्य में चीड़ और देवदार के छिलकों से बने होला जलाकर रातभर पारंपरिक गीतों से झूमते रहे। मंगसीर बग्वाल के पहले दिन घरों में पारंपरिक पकवान सीडके, अस्के और दूसरे दिन बड़ी बग्वाल पर पूरी-पकोड़े आदि बनाए गए। तीसरे दिन बलिराज का जश्न मनाया जाता है। घर-घर से बच्चे व युवा अपने हर घर से थोड़ा भावर घास लाते हैं। इससे एक मोटा रस्सा बनाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ब्रत कहा जाता है। गांवों में बनाए गए ब्रत की गांव के स्याणा विशेष पूजा-अर्चना कर युवा टोलियों में बंटकर रस्साकशी की भांति ब्रत को खीचतें हैं। टूटने के बाद ब्रत के टुकड़ों के रेशों को प्रसाद की भांति टोपी व कानों में लगाकर विभिन्न प्रकार के खेलों का आयोजन होता है। इससे पूर्व घर की महिलाएं अपने घरों के दरवाजों की पूजा-अर्चना कर लाल व पीली रौली लगाकर विशेष पकवान तैयार करती हैं।