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मंडी: रक्षाबंधन के साथ जोगिंद्रनगर में शुरू हुई गुग्गा गाथा, जन्माष्टमी तक घर-घर होगा गुणगान

Ankesh Dogra Updated Fri, 28 Aug 2026 02:42 PM IST

रक्षाबंधन पर्व के साथ ही जोगिंद्रनगर उपमंडल में शुक्रवार से गुग्गा गाथा की पारंपरिक शुरुआत हो गई। क्षेत्र में यह धार्मिक और लोक परंपरा रक्षाबंधन से शुरू होकर जन्माष्टमी तक चलती है। इस दौरान गुग्गा जाहरवीर की भक्त मंडलियां गांव-गांव और घर-घर पहुंचकर पारंपरिक गीतों के माध्यम से गुग्गा गाथा का गुणगान करती हैं। साथ ही लोगों के सुख, शांति और खुशहाली की कामना की जाती है। रक्षाबंधन के दिन से शुरू होने वाली यह परंपरा जोगिंद्रनगर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की लोक संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है। मंडलियों के गांव में पहुंचने पर लोग श्रद्धा के साथ गाथा सुनते हैं और लोक देवता गुग्गा जाहरवीर का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपरा गुग्गा गाथा लिखित साहित्य के बजाय मुख्य रूप से मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। इसमें लोक देवता गुग्गा की महिमा, उनके जीवन और उनसे जुड़ी लोक मान्यताओं का गीतों के माध्यम से वर्णन किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार श्रावण मास में गुग्गा गाथा का गायन और श्रवण धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु इसे आस्था और आध्यात्मिक शांति से जोड़कर देखते हैं। लोक मान्यताओं में गुग्गा जाहरवीर को सांपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में उन्हें गोगाजी, गुग्गा, जाहरवीर और जाहर पीर जैसे नामों से जाना जाता है। गुग्गा गाथा के माध्यम से श्रद्धालु उनकी कृपा और आशीर्वाद की कामना करते हैं। साथ ही सर्पदंश से सुरक्षा और परिवार की खुशहाली के लिए भी प्रार्थना की जाती है। पोहल से कुराटी पहुंची भक्त मंडली इसी परंपरा के तहत शुक्रवार को ग्राम पंचायत पिपली के गांव पोहल से गुग्गा छतरी महाराज की भक्त मंडली गांव कुराटी पहुंची। मंडली ने यहां पारंपरिक तरीके से गुग्गा गाथा का गुणगान किया। मंडली के गांव पहुंचने पर लोगों ने श्रद्धा के साथ गाथा सुनी। इस आयोजन के साथ ही जोगिंद्रनगर क्षेत्र में रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक चलने वाली गुग्गा गाथा की परंपरा का सिलसिला शुरू हो गया। गांव-गांव पहुंचने वाली ये मंडलियां न केवल धार्मिक आस्था को जीवंत रखती हैं, बल्कि स्थानीय लोकगीत, मौखिक इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का काम भी करती हैं।

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