पांच दिवसीय मसूरी शरदोत्सव का समापन लोक संस्कृति और संगीत के यादगार रंगों के साथ हुआ। अंतिम सांस्कृतिक संध्या जागर सम्राट पद्मश्री प्रीतम भरतवाण के नाम रही। उन्होंने अपने लोकप्रिय जागरों और गढ़वाली लोकगीतों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रीतम भरतवाण के गीतों की धुन पर लोग देर रात तक झूमते रहे। पूरा माहौल उत्तराखंड की लोक संस्कृति के रंगों से सराबोर हो गया। उन्होंने ‘शुभ संध्या’, ‘हिमवंती देसा’, ‘लाड़ी बेटुली’ और ‘शिवजी कैलाश’ जैसे कई लोकप्रिय जागर प्रस्तुत किए। इसके साथ ही उन्होंने लगातार लोकगीतों की प्रस्तुति देकर कार्यक्रम में समा बांध दिया। उनके जागरों और पारंपरिक गीतों में पहाड़ की लोक आस्था, देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा और गढ़वाली संस्कृति की झलक मिली। उनकी गायकी और पारंपरिक धुनों ने दर्शकों को लोक संस्कृति से जोड़ा। गीतों के दौरान दर्शक तालियां बजाकर कलाकार का उत्साह बढ़ाते रहे। लोक संगीत की गूंज के बीच लोग देर रात तक कार्यक्रम का आनंद लेते रहे।