देहरादून। चीन सरकार की ओर से लागू किए गए कथित जातीय एकता और प्रगति कानून को तिब्बती पहचान, भाषा, संस्कृति और धार्मिक विरासत के लिए गंभीर खतरा बताते हुए इसे तत्काल रद्द करने की मांग की गई। तिब्बती कल्याण अधिकारी छेवांग फुंतसोक और देहरादून तिब्बतेन सेटलमेंट ऑफिस से तेनजिंग पैल्जॉब ने हिंदी सभागार में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह बात कही। उन्होंने कहा कि तिब्बत का भविष्य जबरन आत्मसात करने से नहीं, बल्कि संवाद, न्याय और शांतिपूर्ण समाधान से तय होना चाहिए। उन्होंने कहा कि चीन ने 12 मार्च 2026 को यह कानून पारित किया, जिसे एक जुलाई से लागू किया गया है। उनके अनुसार कानून के माध्यम से तिब्बतियों सहित अन्य जातीय अल्पसंख्यकों की अलग भाषा, संस्कृति, धर्म और पहचान को समाप्त कर उन्हें चीनी व्यवस्था में आत्मसात करने का प्रयास किया जा रहा है।