Monopoly Case: ऑनलाइन मोनोपोली केस हार गया गूगल, बेचना पड़ सकता है क्रोम ब्राउजर

प्रदीप पाण्डेय
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीप्रदीप पाण्डेय
Sat, 19 Apr 2025 12:04 PM IST
सार

अब यह केस भी "रिमेडीज फेज" (सजा तय करने की प्रक्रिया) में है और अगले हफ्ते से इस पर सुनवाई शुरू होगी। संभावित उपायों में गूगल को एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर कड़े प्रतिबंध लगाने या यहां तक कि उसका क्रोम ब्राउजर बेचने का आदेश भी आ सकता है।

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Google lost the online monopoly case may have to sell Chrome browser
Google Chrome - फोटो : FREEPIK

    विस्तार

    टेक जगत की दिग्गज कंपनी गूगल को अमेरिका में एक महत्वपूर्ण एंटीट्रस्ट (प्रतिस्पर्धा विरोधी) केस में बड़ा झटका लगा है। यह मामला ऑनलाइन विज्ञापन बाजार में गूगल की मोनोपॉली से जुड़ा है, जिसमें कोर्ट ने गूगल को दोषी ठहराया है। यह कंपनी के खिलाफ पिछले साल आए फैसले की ही अगली कड़ी है। वहीं, सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनी मेटा (Meta) भी अमेरिका में एक ऐसे मुकदमे का सामना कर रही है, जो न केवल उसके कारोबारी मॉडल को बदल सकता है, बल्कि दुनिया भर में लोगों के संवाद करने के तरीके पर भी असर डाल सकता है।

    ऑनलाइन विज्ञापन मोनोपॉली केस-

    अमेरिकी न्याय विभाग ने आरोप लगाया कि गूगल ने डिजिटल विज्ञापन तकनीक बाजार में एकाधिकार जमाने के लिए प्रतिस्पर्धा विरोधी तरीके अपनाए। न्यायाधीश लियोनी ब्रिंकमा ने अपने फैसले में कहा कि गूगल ने "जानबूझकर ऐसी गतिविधियां कीं" जिससे उसने "ओपन वेब डिस्प्ले पब्लिशर एड सर्वर मार्केट" में पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया। अब जब दोष सिद्ध हो चुका है, न्याय विभाग अदालत से मांग करेगा कि गूगल को अपनी कुछ एड टेक सेवाएं बेचनी पड़ें। गूगल ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने का एलान किया है।

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    सर्च इंजन मोनोपॉली केस-

    यह केस गूगल की सर्च इंजन बाजार में पकड़ बनाए रखने की रणनीति से जुड़ा है। आरोप है कि गूगल ने Apple जैसी कंपनियों को अरबों डॉलर देकर यह सुनिश्चित किया कि आईफोन जैसे उपकरणों पर डिफॉल्ट सर्च इंजन गूगल ही रहे। अगस्त 2024 में एक फेडरल जज ने माना कि गूगल ने ग़लत तरीकों से एकाधिकार बनाए रखा।

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    अब यह केस भी "रिमेडीज फेज" (सजा तय करने की प्रक्रिया) में है और अगले हफ्ते से इस पर सुनवाई शुरू होगी। संभावित उपायों में गूगल को एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर कड़े प्रतिबंध लगाने या यहां तक कि उसका क्रोम ब्राउजर बेचने का आदेश भी आ सकता है।

    FTC (फेडरल ट्रेड कमीशन) का आरोप है कि मेटा ने "Buy-or-Bury" रणनीति अपनाकर प्रतिस्पर्धा को खत्म किया। उदाहरण से समझें तो कंपनी ने 2012 में Instagram और 2014 में WhatsApp को इसलिए खरीदा ताकि वे Facebook को चुनौती न दे सकें। FTC के अनुसार, इस रणनीति से उपभोक्ताओं के विकल्प कम हुए और इनोवेशन को नुकसान पहुंचा। अब आयोग चाहता है कि Meta को मजबूर किया जाए कि वह Instagram और WhatsApp को अलग-अलग कंपनी के रूप में बेच दे। Meta का तर्क है कि वह मोनोपॉली नहीं रखती और उसे TikTok, YouTube और X (पूर्व Twitter) जैसी कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलती है।

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