गली गली आबाद थी जिन से कहाँ गए वो लोग
दिल्ली अब के ऐसी उजड़ी घर घर फैला सोग
सारा सारा दिन गलियों में फिरते हैं बेकार
रातों उठ उठ कर रोते हैं इस नगरी के लोग
सहमे सहमे से बैठे हैं रागी और फ़नकार
भोर भए...और पढ़ें
मोहब्बत का असर जाता कहाँ है
हमारा दर्द-ए-सर जाता कहाँ है
दिल-ए-बेताब सीने से निकल कर
चला है तू किधर जाता कहाँ है
अदम कहते हैं उस कूचे को ऐ दिल
इधर आ बे-ख़बर जाता कहाँ है
कहूँ किस मुँह...और पढ़ें
ये किस ने कहा तुम कूच करो बातें न बनाओ इंशा-जी
ये शहर तुम्हारा अपना है इसे छोड़ न जाओ इंशा-जी
जितने भी यहाँ के बासी हैं सब के सब तुम से प्यार करें
क्या उन से भी मुँह फेरोगे ये ज़ुल्म न ढाओ इंशा-जी
क्या सोच...और पढ़ें
मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ, पर तुम्हें भूला नहीं हूँ।
चल रहा हूँ, क्योंकि चलने से थकावट दूर होती,
जल रहा हूँ क्योंकि जलने से तिमिस्रा चूर होती,
गल रहा हूँ क्योंकि हल्का बोझ हो जाता हृदय का,
ढल रहा हूँ क्योंकि ढलकर साथ...और पढ़ें
आपके भीतर एक शांति और आश्रय है जहाँ आप किसी भी समय वापस जा सकते हैं और स्वयं बन सकते हैं।
- हरमन हेस
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लोग भी क्या हैं किसी का दिल दुखा कर ख़ुश हुए
फूल पर बैठी हुई तितली उड़ा कर ख़ुश हुए
प्यास हम अपनी बुझा लें ये इजाज़त है कहाँ
फिर भी ऐ दरिया तिरे नज़दीक आकर ख़ुश हुए
मर्ज़ को पाले हुए रखना समझदारी नहीं
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निगाह-ए-नाज़ का इक वार कर के छोड़ दिया
दिल-ए-हरीफ़ को बेदार कर के छोड़ दिया
हुई तो है यूँही तरदीद-ए-अहद-ए-लुत्फ़-ओ-करम
दबी ज़बान से इक़रार कर के छोड़ दिया
छुपे कुछ ऐसे कि ता-ज़ीस्त फिर न आए नज़र
रहीन...और पढ़ें
होती है ज़िंदगी से शिकायत कभी कभी
याद आती है किसी की रफ़ाक़त कभी कभी
वैसे तो हम नहीं हैं तिरी बात के ख़िलाफ़
मर जाती है मगर ये शराफ़त कभी कभी
इतना न ख़ुद को देख ज़माने की आँख से
दे दे कुछ अपन...और पढ़ें
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- निरावरण, जिसका अर्थ है- आवरणरहित, खुला हुआ। प्रस्तुत है नरेन्द्र शर्मा कविता- धरती पर धरो चरण
जीवन की अंधियारी
रात हो उजारी!
धरती पर धरो चरण
तिमिर-तम हारी
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