कविता

11 Poems

                                                                           मुझे प्राप्त है जनता का बल
वह बल मेरी कविता का बल
मैं उस बल से
शक्ति प्रबल से
एक नहीं-सौ साल जिऊंगा
काल कुटिल विष देगा तो भी
मैं उस विष को नहीं पिऊंगा

मुझे प्राप्त है जनता का स्वर
वह स्व...और पढ़ें
44 minutes ago
                                                                           जब ढह रही हों आस्थाएं
जब भटक रहे हों रास्ता
तो इस संसार में एक स्त्री पर कीजिए विश्वास...और पढ़ें
20 hours ago
                                                                           इतने दिनों के बाद
वह इस समय ठीक
मेरे सामने है

न कुछ कहना
न सुनना
न पाना
न खोना
सिर्फ़ आँखों के आगे
एक परिचित चेहरे का होना

होना-
इतना ही काफ़ी है

बस...और पढ़ें
1 day ago
                                                                           प्यार तो करना बहुत आसान प्रेयसी ! 
अंत तक उसका निभाना ही कठिन है। 

है बहुत आसान ठुकराना किसी को, 
है न मुश्किल भूल भी जाना किसी को, 
प्राण-दीपक बीच साँसों को हवा में 
याद की बाती जलाना ही कठिन है 
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1 day ago
                                                                           तूफ़ानी लहरें हों
अम्बर के पहरे हों
पुरवा के दामन पर दाग़ बहुत गहरे हों
सागर के मांझी मत मन को तू हारना
जीवन के क्रम में जो खोया है, पाना है
पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है

राजवंश रूठे तो
राजमु...और पढ़ें
2 days ago
                                                                           पौधे से तुम पेड़ हो गए
जड़ से अलग नहीं हो जाना।
छाया देने लगे हो तो क्या
अहंकार में मत खो जाना।

पतझर तो आता जाता है
तुम उससे मत घबराना
फल का जब मौसम आए
नतमस्तक तब तुम हो जाना।

सेवा...और पढ़ें
3 days ago
                                                                           कोरोना जैसी महामारी 
किसी ने देखी नहीं है 

इसके पहले 1918 में 
स्पैनिश फ़्लू आया था 
सिर्फ़ हिंदुस्तान में 
डेढ़ से दो करोड़ लोग मरे थे ...और पढ़ें
3 days ago
                                                                           एक तिनका
मैं घमण्डों में भरा ऐंठा हुआ।
एक दिन जब था मुण्डेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ
एक तिनका आंख में मेरी पड़ा।

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा 
लाल होकर आंख भी दुखने लगी 
मूंठ देने लोग कपड़े क...और पढ़ें
4 days ago
                                                                           झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से
झुर-झुर सरसों की रंगीनी,
धूसर धूप हुई मन पर ज्यों -
सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की।...और पढ़ें
5 days ago
                                                                           कवि मरते हैं 
जैसे पक्षी मरते हैं 
गोधूलि में ओझल होते हुए! 

सिर्फ़ उड़ानें बची रह 
जाती हैं ...और पढ़ें
5 days ago
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