सुनो, सुनाती हूँ मैं सबको
गौरव गाथा बिहार की,
यह वह धरती है जहाँ नींव पड़ी
प्रथम अखंड साम्राज्य की।
प्राचीन मगध की गाथाएँ
इतिहास यहाँ की गढ़ती हैं,
वीरों से सजी इस माटी में
ज्ञान की गंगा बहती है।
नालंदा के खंडहर को देखो,
जलती थी कभी यहाँ ज्ञान की ज्योति,
तुर्क आक्रमणकारियों के कारण
बन गई आज यह राख की ढेरी।
जहाँ बिंबिसार की नीतियाँ
राजगृह की दीवारों पर शोर मचाती हैं,
वहीं अजातशत्रु का पराक्रम
पाटलिपुत्र की गलियों में धूम मचाता है।
और चंद्रगुप्त के शौर्य को देखो,
जिसने नंद के दंभ को तोड़ा था,
गुरु चाणक्य के सान्निध्य में रहकर
पूरे भारतवर्ष को जोड़ा था।
कलिंग के रक्तपात को देखकर
जहाँ सम्राट अशोक का मन बदला था,
तलवारों की ताकत को छोड़कर
उसने दया का मार्ग पकड़ा था।
जहाँ गंगा की पावन धारा
लाए हरियाली जीवन में,
हिमालय की गोद से निकलकर
नदियाँ खेलें इस माटी के आँगन में।
वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान
जो बिहार की शान है,
गंडक नदी के तट पर स्थित
यह क्षेत्र जैव-विविधता की पहचान है।
यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता
महर्षि वाल्मीकि की याद दिलाती है,
महान ग्रंथ रामायण के रचयिता
राम के आदर्शों को बतलाती है।
हमारे राजकीय पुष्प गेंदा
सुंदरता और सरलता का प्रतीक है,
औषधीय गुणों से भरपूर यह फूल
आस्था और संस्कृति के समीप है।
बुद्ध और महावीर का संदेश
हमें धर्म का मार्ग दिखाता है,
जन्म और जाति से ऊपर उठकर
कर्म और आचरण को सत्य बताता है।
दशरथ माँझी का दृढ़ संकल्प
यह सीख हमें दिलाता है,
मेहनत अगर सच्ची हो तो
पर्वत भी शीश झुकाता है।
जहाँ विद्यापति की नचारी
शिव की स्तुति गाते हैं,
भक्ति भाव में विवश हो
प्रभु स्वयं उगना बनकर आते हैं।
पान, मखाना, आम और लीची
हमारी कृषि-संपदा की जान हैं,
कतरनी चावल और चूड़ा
भागलपुर-बाँका की पहचान हैं।
लिट्टी-चोखा, आम का अचार
हमारे दिलों को लुभाते हैं,
और छठ पूजा का ठेकुआ
हम सब मिल-बाँटकर खाते हैं।
— नूतन झा
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