'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- श्रीहीन, जिसका अर्थ है- जो तेज से हीन हो या जिसमें तेज न हो। प्रस्तुत है जगदीश गुप्त की कविता- हो गयी सांझ जीवन में
जिस दिन से संज्ञा आई
छा गयी उदासी मन में
ऊषा के दृग खुलते ही
हो गयी सांझ जीवन में।।1।।
मुँह उतर गया है दिन का
तरुओं में बेहोशी है
चाहे जितना रंग लाये
फिर भी प्रदोष दोषी है ।।2।।
रिव के श्रीहीन दृगों में
जब लगी उदासी घिरने
संध्या ने तम केशों में
गूँथी चुन कर कुछ किरनें।।3।।
जलदों के जल से मिल कर
फिर फैल गये रंग सारे
व्याकुल है प्रकृति चितेरी
पट कितनी बार संवारे।।4।।
किरनों के डोरे टूटे
तम में समीर भटका है।
जाने कैसे अम्बर में,
यह जलद-पटल अटका है।।5।।
रिश्मयाँ जलद से उलझीं,
तिमराभ हुई अरुणाई।
पावस की साँझ रंगीली,
गीली-गीली अलसाई।।6।।
अधरों की अरुणाई से,
मेरी हर साँस सनी है
उन नयनों की श्यामलता,
जीवन में तिमर बनी है।।7।।
आँसू की कुछ बूँदों में,
सारा जीवन सीमित है।
पलकों का उठना-गिरना,
मेरे सुख की अथ-इति है।।8।।
प्रतिकूल हुए जब तुम ही,
तब कूल कहाँ से पाऊँ,
सुधि की अधीर लहरों में,
कब तक डुबूँ-उतराऊँ।।9।।
उस दिन तुमने हाँ कहकर,
निश्छल विश्वास दिलाया।
अब कितने अब्द बिताऊँ,
ले एक शब्द की माया।।10।।
बुझ सकी न प्यास हृदय की,
अधरों की मधुराई से।
कुछ माँग रही है जैसे,
तरुणाई तरुणाई से।।11।।
तुम हो कि सतत नीरव हो,
संध्या की कमल-कली से।
गुंजन भी छीन लिया है,
बंदी मधु-मुग्ध अली से।।12।।
इस विस्तृत कोलाहल में,
मैं पूछ रहा अपने से।
वे सत्य हृदय के सारे,
क्यों आज हुये सपने से।।13।।
क्या उस सम्पूर्ण सृजन की,
निमर्म परिपूर्ति व्यथा थी।
जो कुछ देखा सपना था,
जो कुछ भी सुना कथा थी।।14।।
वीथियाँ विकल बिलखातीं,
बलखाती बहती धारा।
अब भी मेरे मानस में,
बसता प्रतिबम्ब तुम्हारा।।15।।
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