कि उद्यमी अब तो सुन लो जरा ज्यादा अब ना वार करो।
मेहनत कर हारे छात्रों पर, कुछ तो तुम उपकार करो।
त्याग घमंड को नीचे उतरो जन-जन का कल्याण करो।
दिन-रात पढ़ते बच्चों का, जीवन ना तुम पाषाण करो।
सूख गया है कंठ हमारा, आंखें भी हैं पथराई।
क्या न्याय मांगना गलत यहाँ है, कौन करेगा सुनवाई?
जन-जन ने देखा था उसको कैसे ढोंग कृत्य है।
मरा नहीं वह मारा गया है यही अटल सत्य है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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