आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हल हो गए हैं

                
                                                         
                            जवाल से निकले हम, सफल हो गए हैं,
                                                                 
                            
जटिल प्रश्न भी हमसे हल हो गए हैं।

आज के जदीद इंसान में उलझन बहुत है,
जेहन में मसलों के जंगल हो गए हैं।

किसे दोष दें और किसको बेदाग़ कहें,
आज के सारे चेहरे कल हो गए हैं।

हमने जब भी हटाया नफ़रत को बाज़ार से,
हमें ही हटा दिया—हम इतने सरल हो गए हैं।

ताजमहल को प्यार की मिसाल मत कहो,
मेरे दिल में ऐसे अनगिनत महल हो गए हैं।

कुछ हुनर आसमाँ छू रहे हैं अपने दम पर,
कुछ हुनर केवल किसी की नकल हो गए हैं।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर