जवाल से निकले हम, सफल हो गए हैं,
जटिल प्रश्न भी हमसे हल हो गए हैं।
आज के जदीद इंसान में उलझन बहुत है,
जेहन में मसलों के जंगल हो गए हैं।
किसे दोष दें और किसको बेदाग़ कहें,
आज के सारे चेहरे कल हो गए हैं।
हमने जब भी हटाया नफ़रत को बाज़ार से,
हमें ही हटा दिया—हम इतने सरल हो गए हैं।
ताजमहल को प्यार की मिसाल मत कहो,
मेरे दिल में ऐसे अनगिनत महल हो गए हैं।
कुछ हुनर आसमाँ छू रहे हैं अपने दम पर,
कुछ हुनर केवल किसी की नकल हो गए हैं।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
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