दिल-ए-नाकाम के हैं काम ख़राब
कर लिया आशिक़ी में नाम ख़राब
इस ख़राबात का यही है मज़ा
कि रहे आदमी मुदाम ख़राब
देख कर जिंस-ए-दिल वो कहते हैं
क्यूँ करे कोई अपने दाम ख़राब
अब्र-ए-तर से सबा...और पढ़ें
मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं
कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं
ये कह कह के हम दिल को बहला रहे हैं
वो अब चल चुके हैं वो अब आ रहे हैं
वो अज़-ख़ुद ही नादिम हुए जा रहे हैं
ख़ुदा जाने क्या...और पढ़ें
अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली ...और पढ़ें
जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है
ज़िंदगी रोज़ नए रंग बदलती क्यूँ है
धूप के क़हर का डर है तो दयार-ए-शब से
सर-बरहना कोई परछाईं निकलती क्यूँ है
मुझ को अपना न कहा इस का गिला तुझ से नहीं
इस का शिकव...और पढ़ें
ये निकहतों की नर्म-रवी ये हवा ये रात
याद आ रहे हैं इश्क़ को टूटे तअ'ल्लुक़ात
मायूसियों की गोद में दम तोड़ता है इश्क़
अब भी कोई बना ले तो बिगड़ी नहीं है बात
कुछ और भी तो हो इन इशारात के सिवा
ये सब...और पढ़ें
उस को देखा था फ़क़त दो-चार लम्हों के लिए
हो गए तन्हा जहाँ में कितनी सदियों के लिए
रात का पिछ्ला पहर मुझ को बशारत दे गया
आ रही है रौशनी तारीक गलियों के लिए
कोई सी रुत हो सदा पाया है उन को सोगवार
मौसमो...और पढ़ें
ख़िज़ाँ की ज़र्द सी रंगत बदल भी सकती है
बहार आने की सूरत निकल भी सकती है
जला के शम्अ अब उठ उठ के देखना छोड़ो
वो ज़िम्मेदारी से अज़-ख़ुद पिघल भी सकती है
है शर्त सुब्ह के रस्ते से हो के शाम आए
तो रात उ...और पढ़ें
मिरी नज़र से न हो दूर एक पल के लिए
तिरा वजूद है लाज़िम मिरी ग़ज़ल के लिए
कहाँ से ढूँढ के लाऊँ चराग़ सा वो बदन
तरस गई हैं निगाहें कँवल कँवल के लिए
किसी किसी के नसीबों में इश्क़ लिक्खा है
हर इक...और पढ़ें
तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ
मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ
मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल
मैं संग-ए-राह हूँ तो सभी रास्तों में हूँ
तू आ चुका है सत्ह पे कब से ख़बर नहीं
बेद...और पढ़ें
अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली...और पढ़ें