'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- कलानिधि, जिसका अर्थ है- चन्द्रमा, कलाकार। प्रस्तुत है महेन्द्र भटनागर की कविता- मोहक सपनों की छाया है !
रे मूक कलानिधि के मुख पर
मोहक सपनों की छाया है !
दिन म...और पढ़ें
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- संधान, जिसका अर्थ है- निशाना लगाना, खोज। प्रस्तुत है जगदीश व्योम की कविता- रात की मुट्ठी
वक्त का आखेटक
घूम रहा है
शर संधान किए
लगाए है टकटकी
कि हम
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'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- खड्ग, जिसका अर्थ है- एक प्रकार की तलवार, खाँड़ा। प्रस्तुत है विमल राजस्थानी की कविता- धरती को श्वर्ग बना मानव !
धरती को स्वर्ग बना मानव !
तू मुक्ति-मोक्ष की बात न कर
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'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- संघात, जिसका अर्थ है- समूह, समष्टि, वध। प्रस्तुत है हरिवंशराय बच्चन की कविता- ओ अँधेरी से अँधेरी रात !
ओ अँधेरी से अँधेरी रात!
आज गम इतना हृदय में,
आज तम इतना...और पढ़ें
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अभीत, जिसका अर्थ है- निडर, निर्भय। प्रस्तुत है उर्मिलेश की कविता- हम मन के विपरीत लिखें
कड़वे घूँट पियें फिर कैसे
मीठे गीत लिखें
तुम्हीं बता दो
कैसे हम मन के व...और पढ़ें
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- श्रीहीन, जिसका अर्थ है- जो तेज से हीन हो या जिसमें तेज न हो। प्रस्तुत है जगदीश गुप्त की कविता- हो गयी सांझ जीवन में
जिस दिन से संज्ञा आई
छा गयी उदासी मन में
ऊषा के दृग...और पढ़ें
हिंदी हैं हम शब्द-शृंखला में आज का शब्द है आसव जिसका अर्थ है 1.रस 2.अर्क 3.मदिरा। कवयित्री महादेवी वर्मा ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है।
इन हीरक से तारों को
कर चूर बनाया प्याला,
पीड़ा का सार मिलाकर
प्...और पढ़ें
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- तंतु, जिसका अर्थ है- सूत, संतान, विस्तार। प्रस्तुत है गुलाब खंडेलवाल की कविता- अनजाना देश और अनचीन्हे लोग
निरुद्देश्य, नि:संबल, निष्क्रमित, निरस्त
अंकित कुछ शब्दों में जीवनी...और पढ़ें
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- पयोद, जिसका अर्थ है- बादल, मेघ। प्रस्तुत है हरिवंशराय बच्चन की कविता- अजेय तू अभी बना!
अजेय तू अभी बना!
न मंजिलें मिलीं कभी,
न मुश्किलें हिलीं कभीं,
मगर...और पढ़ें
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- दुर्ग, जिसका अर्थ है- गढ़ , कोट , किला। प्रस्तुत है अनामिका अनु की कविता- जब वे चलती हैं
जाति को कूट-पीस कर खाती लड़कियों
के गले से वर्णहीन शब्द नहीं निकलते,
लेकिन निक...और पढ़ें