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अहमद मुश्ताक़: तिरा वुजूद ही सब से बड़ी हक़ीक़त है

ahmad mushtaq famous ghazal tera vajood hi sab se badhi haqeeqat hai
                
                                                         
                            


तिरा वुजूद ही सब से बड़ी हक़ीक़त है
तुझे भुला नहीं सकता यही मोहब्बत है

गिला नहीं है तिरी बे-त'अल्लुक़ी से मुझे
मैं जानता हूँ तुझे भूलने की 'आदत है

दिल-ए-हज़ीं को बड़ी देर में हुआ मा'लूम
यही कि तेरी मोहब्बत मिरी ज़रूरत है

मिरी तलब में है ठंडक गए ज़मानों की
तिरे लहू में नए मौसमों की हिद्दत है

ख़ुद अपनी ज़ात का जब तज्ज़िया किया तो खुला
तिरे बग़ैर भी जीने की एक सूरत है

2 घंटे पहले

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