उत्तरकाशी: दयारा बुग्याल की हरियाली पर प्रहार, भू-धंसाव-भूस्खलन से बन रहीं खाइयां, दुर्लभ फूलों पर भी खतरा
उत्तराखंड की प्राकृतिक धरोहर दयारा बुग्याल की खूबसूरती और जैव विविधता पर खतरा बढ़ रहा है। अनियोजित पर्यटन, मवेशियों के बढ़ते दबाव और भू-धंसाव से यहां के हरे-भरे मैदान प्रभावित हो रहे हैं। दुर्लभ फूलों और वनस्पतियों को बचाने के लिए संरक्षण के ठोस प्रयास जरूरी हैं।
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उत्तराखंड के प्रसिद्ध दयारा बुग्याल की खूबसूरती पर अब संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अनियोजित पर्यटन और मवेशियों के बढ़ते दबाव से दुर्लभ फूलों व वनस्पतियों का अस्तित्व खतरे में है। वहीं भू-धंसाव और भूस्खलन से हरेभरे घास के मैदानों में खाइयां बन रही हैं। बुग्याल के निचले हिस्सों से बुग्याली घास का दायरा सिमटने लगा है। ऐसे में इस प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए सरकारी मशीनरी और स्थानीय लोगों के साझा प्रयास जरूरी हो गए हैं।
समुद्रतल से करीब 11 से 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित दयारा बुग्याल पर लोगों की लापरवाही व वन विभाग की अनदेखी भारी पड़ रही है। वहां पर पिछले कुछ वर्षों में बुग्याल क्षेत्र में भू-धंसाव व भूस्खलन के कारण घास के मैदान में खाइयां हो गई है। स्थानीय निवासी यजवेंद्र रावत का कहना है कि पर्यटन से हमारी आजीविका चलती है लेकिन अनियोजित पर्यटन के साथ ही वहां पर ग्रामीणों की ओर से मवेशियों के छोड़े जाने के कारण बुग्याल, फूल व वनस्पति विलुप्ति के कगार पर हैं।
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स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि अगर बुग्याल की घास का लुत्फ उठाना है तो दयारा बुग्याल के टॉप पर सूर्याटॉप व देवकुंड जाना होगा। बुग्याल के निचले इलाकों पर अब बुग्याली घास देखना मुश्किल है। अगर बुग्याल बचाना है तो सरकारी मशीनरी और स्थानीय लोगों को मिलकर कार्य करना होगा। रेंज अधिकारी शेखर राणा का कहना है कि दयारा बुग्याल के संरक्षण के लिए निरीक्षण सहित रिपोर्ट तैयार कर उच्च स्तर पर भेजी जा रही है। वहां से स्वीकृति मिलने पर बुग्याल व वनस्पतियों के संरक्षण के लिए कार्य किया जाएगा।