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फिर चुनावी मुद्दा बनेंगी बंद विद्युत परियोजनाएं
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उत्तरकाशी। ऊर्जा, रोजगार एवं विकास का संयुक्त जरिया माने जाने वाली पनबिजली परियोजनाएं लोकसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकती हैं। जनपदवासी जिले में बीते एक दशक से बंद पड़ी लोहारीनाग-पाला समेत अन्य बिजली परियोजनाओं को दोबारा चालू करने की मांग कर रहे हैं।
जिले में ही 600 मेगावाट की लोहारीनाग-पाला, 480 मेगावाट की पाला-मनेरी एवं 381 मेगावाट की भैरोंघाटी समेत कई अन्य छोटी परियोजनाओं का निर्माण शुरू हुआ था, लेकिन पर्यावरण को लेकर मचे हल्ले के बीच वर्ष 2010 में सरकार ने परियोजनाओं का निर्माण बंद कर इन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया। उस दौरान राज्य में भाजपा और केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने के कारण दोनों पार्टियों ने परियोजना बंदी के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हुए पल्ला झाड़ दिया।
एक दशक बीतने को है, लेकिन अभी तक बंद की गई बड़ी परियोजनाओं का निर्माण शुरू होना तो दूर प्रस्तावित एवं स्वीकृत अन्य लघु जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण भी शुरू नहीं हो पाया है। हां इस बीच गंगा भागीरथी को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के साथ ही उत्तरकाशी से गोमुख तक के बड़े क्षेत्र को ईको सेंसिटिव जोन घोषित कर यहां पर्यावरण कानूनों को और अधिक सख्ताई के साथ लागू जरूर किया गया है। ऐसे में रोजगार छिनने के साथ ही वन एवं पर्यावरण कानूनों के चलते विकास की गति धीमी होने से क्षेत्र की जनता में रोष है।
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बंद परियोजनाओं को लेकर रुख स्पष्ट करें राजनीतिक दल
उक्रांद नेता विष्णुपाल रावत, होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष शैलेंद्र मटूड़ा, जगमोहन रावत, मोहन सिंह राणा का कहना है कि पनबिजली परियोजनाएं ऊर्जा के साथ ही रोजगार एवं विकास का मुख्य आधार है। सरकार ने पर्यावरण का हवाला देकर इन परियोजनाओं को बंद तो कर दिया, लेकिन इनमें रोजगार पा रहे लोगों के बारे में नहीं सोचा। दोनों ही प्रमुख राजनीतिक पार्टियां परियोजना निर्माण के पक्ष में रही है। इसके बावजूद अभी तक परियोजनाओं का निर्माण शुरू नहीं हुआ है। कई किमी खुदी सुरंगों एवं अधूरे निर्माणों को जस का तस छोड़े जाने से यहां खतरा मंडरा रहा है।
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जिले में ही 600 मेगावाट की लोहारीनाग-पाला, 480 मेगावाट की पाला-मनेरी एवं 381 मेगावाट की भैरोंघाटी समेत कई अन्य छोटी परियोजनाओं का निर्माण शुरू हुआ था, लेकिन पर्यावरण को लेकर मचे हल्ले के बीच वर्ष 2010 में सरकार ने परियोजनाओं का निर्माण बंद कर इन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया। उस दौरान राज्य में भाजपा और केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने के कारण दोनों पार्टियों ने परियोजना बंदी के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हुए पल्ला झाड़ दिया।
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एक दशक बीतने को है, लेकिन अभी तक बंद की गई बड़ी परियोजनाओं का निर्माण शुरू होना तो दूर प्रस्तावित एवं स्वीकृत अन्य लघु जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण भी शुरू नहीं हो पाया है। हां इस बीच गंगा भागीरथी को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के साथ ही उत्तरकाशी से गोमुख तक के बड़े क्षेत्र को ईको सेंसिटिव जोन घोषित कर यहां पर्यावरण कानूनों को और अधिक सख्ताई के साथ लागू जरूर किया गया है। ऐसे में रोजगार छिनने के साथ ही वन एवं पर्यावरण कानूनों के चलते विकास की गति धीमी होने से क्षेत्र की जनता में रोष है।
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बंद परियोजनाओं को लेकर रुख स्पष्ट करें राजनीतिक दल
उक्रांद नेता विष्णुपाल रावत, होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष शैलेंद्र मटूड़ा, जगमोहन रावत, मोहन सिंह राणा का कहना है कि पनबिजली परियोजनाएं ऊर्जा के साथ ही रोजगार एवं विकास का मुख्य आधार है। सरकार ने पर्यावरण का हवाला देकर इन परियोजनाओं को बंद तो कर दिया, लेकिन इनमें रोजगार पा रहे लोगों के बारे में नहीं सोचा। दोनों ही प्रमुख राजनीतिक पार्टियां परियोजना निर्माण के पक्ष में रही है। इसके बावजूद अभी तक परियोजनाओं का निर्माण शुरू नहीं हुआ है। कई किमी खुदी सुरंगों एवं अधूरे निर्माणों को जस का तस छोड़े जाने से यहां खतरा मंडरा रहा है।