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शुक्र है, आपदा से ये सबक तो सीखा
सुधाकर भट्ट
Updated Fri, 12 Jul 2013 08:16 AM IST
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ग्रीन जीडीपी के लिए हामी भरकर प्रदेश सरकार ने आपदा का एक सबक तो कम से सीख लेने का इरादा जाहिर कर दिया है। हालांकि यह अभी तय होना बाकी है कि जीईपी(सकल पर्यावरणीय उत्पाद या ग्रीन जीडीपी ) का रंग कैसा होगा।
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पर इतना जरूर साफ है कि पर्वतीय प्रदेश में जीईपी को लागू करने का मतलब है कि संतुलित विकास की ओर कदम बढ़ाना। प्रदेश सरकार ने जीईपी को लागू करने की बात कहकर पूरे देश में पहला राज्य होने का खिताब जरूर हासिल कर लिया है पर यह इतना आसान भी नही होगा।
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खासकर तब जब 2011 में केंद्रीय योजना आयोग की ओर से तैयार किए गए इन्वायरमेंट परफार्मेंस इंडेक्स में पहला स्थान हासिल करने वाला उत्तराखंड 2012 में 16वेंस्थान पर खिसक गया।
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पहाड़ों के लिए विकास के मायने अलग
पहाड़ों पर पिछले कुछ समय से लगातार बरस रही आपदा यह बताने के लिए पर्याप्त है कि पहाड़ों के लिए विकास के मायने अलग होने चाहिए। पहाड़ों की गोद मे फलते-फूलते गांवों के लिए सड़क वरदान भी साबित हो सकती है और अभिशाप भी। सड़क गांवों को बाकी दुनिया से जोड़ देती है पर यही सड़क बेतरतीब तरीके से बनाई जाए तो यह गांवों को विस्थापन के करीब भी पहुंचा देती है।
बांध प्रदेश को ऊर्जा प्रदेश बनाने में मदद करते हैं पर यह कैग रिपोर्ट भी कह चुकी है कि थोक के भाव बनाए जा रहे बांधों से नुकसान की आशंका भी है। हिमालयी क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है। देश के कुल फ्लोरा का 50 प्रतिशत हिमालयी क्षेत्र में ही है। ऐसे में सड़क, बढ़ती आबादी, होटल, लॉज, रिसार्ट की संस्कृति, कंक्रीट के उगते जंगल इस क्षेत्र की जैव विविधता को नुकसान पहुंचा सकती है।
हिमालयी क्षेत्र ऐशिया का वाटर हाउस कहा जाता है। गंगा और यमुना नदियों का क्षेत्र अधिकतर भारत को पानी उपलब्ध कराता है।
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ऐसे में उत्तराखंड के पर्वतीय जिलाें के लिए संतुलित विकास का माडल अपनाना बेहद जरूरी हो जाता है। ऐसा विकास जो प्रकृति का हमकदम हो। केदारनाथ घाटी में हुई तबाही इस बात को पुखता तरीके से सामने भी रखती है।
ऐसे में जीईपी केा प्रदेश की आर्थिकी में शामिल करने पर प्रदेश के नेतृत्व को जबरन पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए कदम भी उठाना पड़ेगा। यही सरकार है जो फिलहाल गंगोत्री को इको सेंसेटिव जोन घोषित करने के विरोध में हैं और 3000 मीटर से अधिक की ऊचाई पर स्थापित चार धामों में उग रहे कंक्रीट के जंगल को नियमित करने में सफल नही रही है।
प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव डा. आरएस टोलिया के मुताबिक देर से सही पर कदम सही है। टोलिया 11वीं पंचवषीय योजना के तहत पर्वतीय इकोस्टिम पर गठित टास्क फोर्स के चेयरमैन भी रहे हैं। नवंबर 2006 में आई टास्क फोर्स की रिपोर्ट में यह साफ कहा गया था कि पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यावरण पर काम करने वाली सभी संस्थाओं को एक छत के नीचे लाया जाना चाहिए और पर्वतीय जिलों में इको टूरिज्म का नियंत्रित होना चाहिए।
क्या है ग्रीन जीडीपी
-प्रदेश की आर्थिकी का मानक है सकल घरेलु उत्पाद या जीडीपी। पर जीडीपी की समस्या यह है कि कई बार पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कारक भी इसमें प्रदेश की कुल आर्थिकी में योगदान करते हुए दिखते है। मसलन उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में दस करोड़ रुपये से बनी सड़क जीडीपी में दस करोड़ रुपये का इजाफा कर देगी। पर खराब रोड इंजीनियरिंग या अन्य कारणों से इस सड़क से सौ करोड़ का नुकसान होता है तो यह जीडीपी में कहीं दिखाई नहीं देगा।
जीईपी का आकलन करने के लिए इस नुकसान का आकलन किया जाएगा और इसे जीडीपी से घटाया जाएगा। बाद में इस नुकसान की भरपाई के लिए सरकारों को अलग से खर्च करना पड़ता है। फिर यह संतुलित विकास भी नहीं कहा जा सकता। कारण यह विकास पर्यावरण की कीमत पर हो रहा होता है। इस भ्रम से बचने के लिए ही जीईपी या ग्रीन जीडीपी की कल्पना की गई।
इसमें पर्यावरण केमानक जैसे वायु, जल प्रदूषण और जल की कमी से स्वास्थ्य, कृषि और अन्य नुकसान, जैव विविधता आदि का नुकसान आदि का आकलन कर उन्हें जीडीपी से घटा दिया जाता है। आधार यह है कि वर्तमान विकास का मॉडल उच्च उपभोग, ज्यादा प्रदूषण और हाई रिस्क का पर्याय भी बन गया है। चीन ने 2004 में ग्रीन जीडीपी को तैयार करते हुए दस मानक लिए थे। जबकि मानक बीस तक लिए जा सकते थे। दस मानक लेने के बाद भी चीन की जीडीपी में तीन प्रतिशत तक का नुकसान आंका गया था। कुछ सेक्टर तो ऐसे थे जहां विकास दर शून्य हो गई थी।
क्या हो रही है कोशिश
-केंद्र सरकार की ओर से 2009 में ग्रीन जीडीपी का आकलन करने की शुरूआत कर दी गई थी। तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसमें पहल की थी। केंद्र सरकार ने तय किया हुआ है कि 2015 तक ग्रीन जीडीपी से संबंधित आंकड़ों को जारी कर देगा। इसके लिए केंद्रीय सांख्यीकि विभाग को जिम्मा सौंपा गया है।
क्या है समस्या
-ग्रीन जीडीपी के सबसे बड़ी समस्या मानकों की है। कई बार कई मानकों को रुपये के रूप में प्रदर्शित करना संभव नही हो पाता। ऐसे में मानकों का चयन महत्वपूर्ण होता है। दूसरी समस्या जीडीपी को लेकर भी है। सरकारें विकास के मॉडल की आदि हैं और जीडीपी इसका सबसे सरल रास्ता है। बड़ती हुई जीडीपी यह बताने के लिए पर्याप्त है कि विकास हो रहा है। ऐसे में जीईपी विकास दर की कमी को सामने कर सकती है।
मौसम बदलाव को लेना होगा गंभीरता से
कहने को उत्तराखंड ने मौसम बदलाव पर अपनी कार्ययोजना 2012 में ही तैयार कर ली थी पर विकास के मामले में यह कार्ययोजना धरातल पर दिखाई नहींदेती। जीईपी में वेस्ट मेनेजमेंट और मोसम बदलाव को गंभीरता से न लेने पर सीधा असर विकास दर पर भी दिखाई देगा। औद्योगिक विकास के कारण कुछ समय पहले तक प्रदेश की विकास दर दहाई के अंक में थी। औद्योगिक पैकेज समाप्त होने के कारण इस बार यह विकास दर अब छह प्रतिशत पर आकर टिक गई है।
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