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राजनीतिक दल मिल मजदूरों की सुध लेना भूले
अमर उजाला ब्यूरो काशीपुर
Updated Mon, 13 Feb 2017 12:31 AM IST
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चुनावी समर में कूदे राजनीतिकदलों के प्रत्याशी प्रचार में स्थानीय समस्याएं उठाकर उन्हें हल करने का वादा जनता से कर रहे हैं। लेकिन किसी भी प्रत्याशी की जुबां पर बंद पड़ी शुगर मिल को चालू कराना, किसानों के बकाया 24 करोड़ रुपए के भुगतान, मजदूरों के बकाया देयकों के भुगतान का मसला नहीं आया है। इससे किसानों के साथ ही मिल मजदूरों में गहरा आक्रोश है।
काशीपुर विधानसभा में बड़ी संख्या में किसान मतदाता है। बंद पड़ी चीनी मिल के बाद बेरोजगार हुए कर्मचारी परिवारों के करीब 3 हजार मतदाता है, लेकिन चुनाव लड़ रहे कांग्रेस, भाजपा, बसपा आदि प्रत्याशी तमाम घिसे-पिटे वादे तो कर रहे हैं, लेकिन वह मिल पर बकाया 24 करोड़ रुपए का भुगतान कराने की बात करने की जहमत तक नहीं उठा रहे हैं। किसानों का 24 करोड़ रुपए और 600 कर्मचारियों का एक साल का वेतन, बकाया भुगतान बाकी है।
बोर्ड फॉर इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंशियल रिकंस्ट्रशन (बीआईएफआर) अदालत ने मिल को नीलाम कर किसानों, कर्मचारियों का बकाया भुगतान के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रतिनिधि को नियुक्त किया है, लेकिन तीन साल बाद भी मिल की नीलामी नहीं हो सकी। बंद पड़ी मिल दिनोंदिन कबाड़ में तब्दील होती जा रही है। सरकार की उदासीनता के चलते किसान और कर्मचारियों को उनका हक नहीं मिल पा रहा है। उनमें आक्रोश है। उनका कहना है कि इसका जवाब मतदान में दिया जाएगा। पहले सरकार और अब कोई भी प्रत्याशी इस मामले को उठाने में दिलचस्पी नहीं ले रहा है। मिल बंद होने से बेरोजगार कर्मचारियों के परिवारों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट बना है। हालांकि एक निर्दलीय प्रत्याशी राजीव ने जरूर अपने घोषणा पत्र में इसका जिक्र किया है।
काशीपुर विधानसभा में बड़ी संख्या में किसान मतदाता है। बंद पड़ी चीनी मिल के बाद बेरोजगार हुए कर्मचारी परिवारों के करीब 3 हजार मतदाता है, लेकिन चुनाव लड़ रहे कांग्रेस, भाजपा, बसपा आदि प्रत्याशी तमाम घिसे-पिटे वादे तो कर रहे हैं, लेकिन वह मिल पर बकाया 24 करोड़ रुपए का भुगतान कराने की बात करने की जहमत तक नहीं उठा रहे हैं। किसानों का 24 करोड़ रुपए और 600 कर्मचारियों का एक साल का वेतन, बकाया भुगतान बाकी है।
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बोर्ड फॉर इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंशियल रिकंस्ट्रशन (बीआईएफआर) अदालत ने मिल को नीलाम कर किसानों, कर्मचारियों का बकाया भुगतान के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रतिनिधि को नियुक्त किया है, लेकिन तीन साल बाद भी मिल की नीलामी नहीं हो सकी। बंद पड़ी मिल दिनोंदिन कबाड़ में तब्दील होती जा रही है। सरकार की उदासीनता के चलते किसान और कर्मचारियों को उनका हक नहीं मिल पा रहा है। उनमें आक्रोश है। उनका कहना है कि इसका जवाब मतदान में दिया जाएगा। पहले सरकार और अब कोई भी प्रत्याशी इस मामले को उठाने में दिलचस्पी नहीं ले रहा है। मिल बंद होने से बेरोजगार कर्मचारियों के परिवारों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट बना है। हालांकि एक निर्दलीय प्रत्याशी राजीव ने जरूर अपने घोषणा पत्र में इसका जिक्र किया है।
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