कारपेंटर के बेटे की काबिलियत: काई के बाद अब जलकुंभी से बनाया कागज, नहीं किया रसायन का इस्तेमाल
कारपेंटर के बेटे ने पर्यावरण के अनुकूल और रसायनों का प्रयोग किए बिना जलकुंभी से कागज बनाने में सफलता हासिल की है। यह कागज पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर बनने वाले कागज से कहीं अधिक मजबूत और टिकाऊ है।
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कारपेंटर के बेटे ने पर्यावरण के अनुकूल और रसायनों का प्रयोग किए बिना जलकुंभी से कागज बनाने में सफलता हासिल की है। यह कागज पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर बनने वाले कागज से कहीं अधिक मजबूत और टिकाऊ है। वह इससे पहले काई से भी कागज का निर्माण कर एशियन वर्ल्ड रिकाॅर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं।
जीबी पंत कृषि विवि से कारपेंटर पद से सेवानिवृत्त रमाशंकर शर्मा चंडीपुर दिनेशपुर में सपरिवार रहते हैं। उनका बेटा सोमेश शर्मा रुद्रपुर के एसबीएस महाविद्यालय में स्नातक का छात्र है। सोमेश ने कोरोना काल में पर्यावरण की स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए काई से कागज बनाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया था। अब उन्होंने जलकुंभी से कागज बनाकर फिर से विश्व में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उन्होंने यह कार्य बिना आधुनिक उपकरणों के ही घर में कर दिखाया है। सोमेश ने बताया कि इस कागज (ए-4) को बनाने में कोई खर्च नहीं आया है, बस मेहनत लगी है।
परीक्षण करने के बाद प्रोनेस एशिया (मलेशिया) के संस्थापक और परीक्षण करने वाले वैज्ञानिकों ने इसे वैश्विक स्तर की उपलब्धि (ऑनर द रियल टैलेंट) मानते हुए सोमेश शर्मा को ''''हैंडमेड पेपर मेड फ्रॉम वाटरह्येसिंथ'''' के लिए एशियन वर्ल्ड रिकाॅर्ड से सम्मानित किया है। उन्होंने सफलता का श्रेय माता-पिता और गुरु संजय कुमार व कौशल कुमार को दिया है।
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जलकुंभी से ऐसे बनाया कागज
सोमेश ने बताया कि पहले उसने नदी और तालाबों से जलकुंभी को एकत्र कर सुखाया और फिर पीस लिया। इसके बाद उबालकर उसमें मौजूद जीवाणु नष्ट किए। जलकुंभी का रंग हरा होने के कारण उन्होंने प्राकृतिक तरीकों से उसे रंगहीन कर दिया। इस पेस्ट को समतल स्थान पर महीन परत के रूप में बिछाकर भारी दबाव डाला। इसके सूखने के बाद मजबूत कागज तैयार हो गया। कागज को काटकर उसकी ए-4 आकार की शीट तैयार कर ली। उन्होंने पंतनगर विवि की लैब में इस कागज का परीक्षण कराया। विवि के अनुभवी वैज्ञानिकों ने इस कागज को सही, मजबूत और टिकाऊ ठहराया है।
जलकुंभी से पानी में होती है ऑक्सीजन की कमी
जलकुंभी से पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिससे मछलियों की वृद्धि रुकने सहित अन्य जलीय वनस्पतियों और जीवों का दम घुटने लगता है। यह पानी के बहाव को 20 से 40 प्रतिशत तक कम कर देती है। बड़े बांधों में जलकुंभी बिजली उत्पादन को भी प्रभावित करती है। सरकार ने नदी व तालाबों को जलकुंभी से मुक्त करने के बहुत प्रयास किए, लेकिन असफल रही। इसी सोच के साथ सोमेश ने एक ऐसी तकनीक खोज निकाली, जो नदियों और तालाबों को तो स्वच्छ करेगी ही, पर्यावरण को भी नुकसान से बचाएगी।