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17004 परिवारों को नहीं मिला शौचालय योजना का लाभ
Mon, 04 Mar 2019 12:31 AM IST
अरुण कुमार
आरडी खान
आरडी खान
Published by: अरुण कुमार
Updated Mon, 04 Mar 2019 12:31 AM IST
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यूपी पुलिस
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जिले में 17004 परिवार अभी भी स्वजल मद में शौचालय योजना के लाभ से वंचित है। पिछले दो वर्षों से सरकार की वेबसाइट बंद रहने के कारण इनके आवेदन अपलोड नहीं हो पा रहे हैं। सर्वे में चयनित पात्रों के आवेदनों की औपचारिकताएं पूर्ण होने के बाद भी उन्हें इस योजना की राशि नहीं मिल पा रही है। अधिकतर पात्रों ने स्वयं के खर्च पर शौचालयों का निर्माण किया है। पिछले डेढ़ वर्ष से वे उक्त राशि के लिए विभागीय अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं।
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जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए) के तहत स्वजल मद में केंद्र सरकार ने खुले में शौच से मुक्त कराने का लक्ष्य रखा है। वर्ष 2012 में ब्लॉकों का सर्वे कराया गया था। दो अप्रैल 2014 से शुरू हुए इस अभियान के तहत जनपद ऊधम सिंह नगर में 72, 990 परिवारों को इस योजना में चयनित किया गया। शौचालय मद में जिले के सभी सात ब्लॉकों के अभ्यर्थियों के आवेदन सरकार की वेबसाइट पर अपलोड कर दिए गए।
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आवेदनों पर पात्रों को शौचालय योजना की सहायता राशि उपलब्ध करा दी गई। यह राशि प्रति परिवार के लिए 12 हजार रुपये निर्धारित है। इसके बाद भी कई गांव अभी भी पूरी तरह ओडीएफ नहीं है। डीआरडीए के परियोजना प्रबंधक जोशी ने बताया कि वर्ष 2016 में सरकार ने इस मद में आवेदन करने वाली वेबसाइट बंद कर दी है। इसके बाद से स्वजल योजना में शौचालय के पात्रों को इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
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बांसखेड़ा कला में 100 से अधिक पात्रों को नहीं मिला लाभ
काशीपुर। ग्राम सभा बांसखेड़ा कला में 100 से अधिक पात्रों को शौचालय सुविधा का लाभ नहीं मिल सका है। पात्रों का कहना है कि डीआरडीए द्वारा कराए गए सर्वे में उनका चयन किया गया था। ग्राम गिन्नीखेड़ा की आशा का कहना है कि उनके गांवों में स्वयं सहायता समूह चलते हैं। अधिकतर पात्रों ने इन समूहों से कर्ज लेकर शौचालयों का निर्माण किया है। लेकिन डेढ़ वर्ष बाद भी उन्हें इस मद में राशि का भुगतान नहीं किया गया।
कोट-
जिले में 72990 पात्रों को शौचालय योजना के तहत लाभान्वित किया जा चुका है। नए सर्वे में 17004 आवेदकों का चयन किया गया है लेकिन सरकारी वेबसाइट बंद होने के कारण आवेदनों को अपलोड नहीं किया जा सका है। वेबसाइट खुलने पर आवेदन अपलोड किए जाएंगे।
-हिमांशु जोशी, परियोजना प्रबंधक।