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Rishikesh News: ... बुजुर्गों की सूनी आंखें करती हैं अपनों का इंतजार

Wed, 04 Sep 2024 06:41 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Wed, 04 Sep 2024 06:41 AM IST
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...The empty eyes of the elderly wait for their loved ones
रोजगार के लिए पहाड़ों से निकले युवा शहरों के होकर ही रह गए। कई गांवों में सन्नाटा पसरा गया है।कुछ गांवों में तो केवल बुजुर्ग ही रह गए हैं। उनकी आंखें हमेशा अपनों का इंतजार करती है। स्थिति यह है कि गांव में जब कोई फेरीवाला पहुंचता है तो बुजुर्गों को बातचीत करने का अवसर मिलता है।
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यमकेश्वर विकासखंड के कई गांव पलायन का दंश झेल रहे हैं। रोजगार के लिए गांव से बाहर गए लोग शहरों में ही बस गए। कुछ गांवों में कभी कभार ही आते हैं। वह भी मेहमान बनकर। कुछ एक रात रूककर वापस लौट जाते हैं अथवा सुविधाओं के अभाव में गांव के आसपास बने होटल रिजॉर्ट में रात्रि बिताकर सुबह अपने मकान में जाकर वापस लौट आते हैं।
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वर्षों पूर्व कई परिवारों के पत्थर की चिनाई से निर्मित एवं पठाल की छत वाले मकान क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। अथवा वर्षों से घरों में आवाजाही एवं देखभाल के बिना मकान की दीवारें टूटकर गिर रही हैं।
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पूरा गांव खाली, कभी-कभी आते हैं लोग



सड़क के बेहद नजदीक गांव मलेलगांव में कभी 22 परिवार रहते थे। वर्तमान में स्थिति यह है कि यहां एक भी परिवार गांव में नहीं रहता है। दिल्ली पलायन कर चुके एक परिवार के कुछ सदस्य सालभर में कुछ सप्ताह के लिए गांव आते हैं। वहीं ऋषिकेश शहर से मात्र 25 किमी की दूरी पर स्थित गांव भी पलायन का दंश झेल रहे हैं। विकासखंड यमकेश्वर के पयां गांव में कभी 80 परिवार रहते हैं। वर्तमान में यहां मात्र 10 परिवारों के 22 सदस्य ही रह रहे हैं। मजेंडी गांव में लगभग 25 परिवारों में से वर्तमान में एक परिवार के मात्र 2 सदस्य रहते हैं। भेलडूंगा गांव में कभी 60 परिवार रहता था। वर्तमान में तीन परिवारों में मात्र छह आदमी रह रहे हैं।



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- रोजगार के लिए पलायन के कारण गांव खाली हो गए हैं। एक दूसरे से बात करने तक को आदमी नहीं रह गए। गांव में फेरी वाला आता है तो बातचीत करने का अवसर मिल जाता है। - कलावती देवी (85), भेलडूंगा गांव

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- गांव में सड़क अब आई है जब बच्चे रोजगार के लिए शहरों में ही बस गए। गांव में बस कुछ ही लोग रह गए हैं। कभी गांव भरा पूरा रहता था। - नीमा देवी (80), आमड़ी तल्ली




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- कभी संयुक्त परिवार होता था। परिवार के सदस्य खेती, पशु पालन कर गुजर बसर करते थे। गांव में चहल पहल रहती थी। त्योहारों पर खूब रौनक रहती थी। अब गांव वीरान हो रहे हैं। - रेखा देवी (90), आमड़ी तल्ली
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