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उड़मा के दस परिवारों ने छोड़ा गांव

Tue, 19 Jul 2016 10:21 PM IST
संजू पंत/अमर उजाला, बस्तड़ी/डीडीहाट
संजू पंत/अमर उजाला, बस्तड़ी/डीडीहाट Updated Tue, 19 Jul 2016 10:21 PM IST
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Udma ten families left the village
उड़मा गांव के लोग - फोटो : अमर उजाला

आपदा प्रभावित उड़मा गांव के 10 परिवारों ने मंगलवार को एक साथ अपने गांव को अलविदा कह दिया। 60 वोटरों वाले इस गांव के लोगों ने जाते समय नेताओं पर कटाक्ष करते हुए कहा कि अब हमर गौं में वोट मांगूहूं झन आया। यानी वोट मांगने के लिए अब हमारे गांव मत आना।

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कई वर्षों से एक साथ रहने वाला दस परिवारों का यह कुनबा 30 जून की आपदा के बाद बिखर गया है। सभी लोग अपने रिश्तेदारों की मदद से अलग-अलग स्थानों को चले गए हैं। इस आपदा ने सामाजिक ताने-बाने को भी बिखेर दिया है। अनुसूचित जाति के ये दस परिवार आर्थिक रूप से संपन्न तो नहीं हैं, लेकिन 30 जून से पहले इनके जीवन में ऐसी कोई कठिनाई भी नहीं आई थी कि वे गांव छोड़ देते। सभी परिवार छोटा-मोटा काम, मेहनत-मजदूरी कर आजीविका चला रहे थे। एक जुलाई को दस परिवारों के 60 लोगों को प्रशासन ने प्राथमिक स्कूल सिंघाली में ठहराया था। तब से अब तक स्थायी आवास की व्यवस्था की राह देख रहे इन परिवारों की सरकारी मदद की उम्मीद खत्म हो गई और उन्होंने फैसला लिया कि अब इस स्थान पर रहना उचित नहीं है। सभी ने अपने-अपने रिश्तेदारों से मदद मांगी और मंगलवार सुबह भरे मन से राहत कैंप भी छोड़ दिया।
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अब तक राहत कैंप में रह रहे परीराम ने परिवार सहित डीडीहाट का रुख किया है। हरकराम देवलथल, फकीर राम खटीमा, हरिप्रसाद दिल्ली, रमेश राम और हरीश राम पिथौरागढ़, जोगाराम, नंदू राम और अशोक राम सिंघाली, धनीराम परिवार समेत अजेड़ा गांव चले गए हैं। उड़मा निवासी अशोक राम ने कहा कि मेहनत-मजदूरी का काम अन्य स्थानों पर भी मिल ही जाएगा। कम से कम यह गारंटी तो रहेगी कि किसी आपदा का शिकार नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि उड़मा गांव रहने लायक नहीं है। वहां पर फिर से बसने का साहस कोई नहीं कर सकता। सरकारी तंत्र और नेताओं पर उनको कोई यकीन नहीं रह गया है। वह कहते हैं कि सिर्फ वोट मांगने के लिए आने वाले नेताओं को चाहिए कि अब उड़मा गांव न जाएं, वहां न उनको कोई आदमी मिलेगा और न वोट।

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