तकलाकोट के पुरांग से शिफ्ट होगा बाजार
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तिब्बत की मंडी तकलाकोट से लौटे व्यापारियों का कहना है कि अगले वर्ष से भारतीय, नेपाली और तिब्बती व्यापारियों के लिए नई बाजार बिलीठं में विकसित हो जाएगी। 1992 से 2000 तक इसी स्थान पर दुकानें लगा करती थी। 2001 में चीन सरकार ने इस बाजार को तकलाकोट के पुरांग में शिफ्ट कर दिया था। अब बिलीठं में आधुनिक किस्म की बाजार, मॉल तैयार हो रहे हैं। उनको व्यापारियों को आवंटित कर दिया जाएगा। व्यापारियों ने बताया कि तकलाकोट के पुरांग में हर व्यापारी को दुकान आवंटित तो हो जाती है, लेकिन उसका किराया पूरे वर्ष का देना होता है, जबकि व्यापार जून से अक्तूबर तक ही चलता है। दुकान के आकार के हिसाब से किराए का भुगतान 18 हजार से 25 हजार रुपए तक सालाना करना होता है।
तिब्बत से लौटकर मंगलवार को धारचूला पहुंचे युवा व्यापारी कल्याण सिंह रायपा ने बताया कि चीन सरकार छोटे स्तर के व्यापारियों को सुविधा देने की दिशा में बड़ा काम कर रही है। रायपा 15 वर्ष से इस व्यापार में हिस्सा ले रहे हैं। उन्होंने बताया कि तकलाकोट से यदि धारचूला फोन से बात करनी हो तो खर्च बहुत आता है। वहां से एक मिनट की कॉल के पांच युवान देने पड़ते हैं। भारतीय मुद्रा में यह राशि 55 रुपए तक बैठ जाती है। उन्होंने बताया कि तकलाकोट में मुद्रा विनिमय का बड़ा खेल चलता है। भारतीय व्यापारियों से एक युआन के बदले 11 रुपए तक वसूल लिए जाते हैं, जबकि एक युआन की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में 9 रुपए कीमत है।
वह कहते हैं कि यह समस्या भारतीय व्यापारिक मंडी गुंजी में मुद्रा विनिमय की सुविधा न होने के कारण पैदा हो रही है। इस बार तकलाकोट मंडी तक सामान तो बहुत गया, लेकिन इसमें कई प्रकार की व्यावहारिक अड़चनों का भी सामना करना पड़ा। चीन सरकार ने लिपुलेख दर्रे के उस पार घोड़ों को ले जाने पर रोक लगा दी थी। सामान को चीन के वाहनों से ले जाना पड़ा। सामान के लिए पूरा वाहन बुक किया गया। इसमें एक बार में 30 हजार रुपए तक खर्च आया।
गुंजी मंडी को विकसित करने की जरूरत
तिब्बत व्यापार में भाग लेने वाले बुजुर्ग व्यापारी पद्म सिंह रायपा, दीवान सिंह गर्ब्याल, दिनेश गुंज्याल, दौलत सिंह रायपा, जीवन सिंह रौंकली, चकर सिंह आदि का कहना है कि भारतीय व्यापारिक मंडी गुंजी को विकसित करने की जरूरत है। गुंजी में स्टेट बैंक की अस्थायी शाखा तो खोली जाती है, लेकिन उसमें मुद्रा विनिमय की सुविधा नहीं है। जब 1992 में भारत और चीन के बीच तिब्बत व्यापार फिर से खोलने की सहमति बनी थी, तब यह तय हुआ था कि तिब्बत के व्यापारी भी गुंजी आएंगे। गुंजी में ट्रेड फेयर लगेगा, लेकिन सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की। 1992 के बाद कोई भी तिब्बती व्यापारी गुंजी नहीं आया।
भविष्य में व्यापार और बढ़ेगा
तिब्बत व्यापार में भाग लेने वाले व्यापारी निराश नहीं है। तमाम तरह की अड़चनों और प्रतिबंधों के बावजूद निर्यात बढ़ना अच्छा संकेत है। व्यापारियों का कहना है कि भविष्य में व्यापार और बढ़ेगा। व्यापार सीमांत के लोगों को आर्थिक मजबूती देगा।