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नौ परिजनों की मौत भी नहीं तोड़ पाई बहादुर का हौसला

Fri, 30 Sep 2016 10:56 PM IST
जीवन दानू/अमर उजाला, नाचनी
जीवन दानू/अमर उजाला, नाचनी Updated Fri, 30 Sep 2016 10:56 PM IST
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Nine family members were killed and not break the spirit of the brave
बुजुर्ग बहादुर सिंह - फोटो : अमर उजाला

जीवटता मनुष्य को कभी टूटने नहीं देती। इसका जीता जागता उदाहरण हैं झेकला के बहादुर सिंह। 91 साल के बहादुर सिंह ने वर्ष 2009 के ला, झेकला आपदा में अपने पुत्रों, बहुओं, पोते, पोतियों को खो दिया। केवल दो विवाहित पोतियां ही बचीं, लेकिन इस बुजुर्ग के हौसले और हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि इस उम्र में भी वह पूरी जीवटता के साथ जिंदगी जी रहे हैं।

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ला, झेकला आपदा से पहले झेकला निवासी बहादुर सिंह का 11 सदस्यों का परिवार था। दोनों लड़कों का विवाह हो चुका था। तीन पोते, चार पोतियों से भरा-पूरा परिवार था। दो पोतियों का विवाह हो चुका था। सब कुछ ठीकठाक चल रहा था पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। 7 अगस्त 2009 की रात बादल फटने से ला, झेकला और बेड़ूमहर में तबाही मच गई। तीनों गांवों के 43 लोग जिंदा दफन हो गए। वो रात बहादुर सिंह के परिवार के लिए काली रात साबित हुई। बहादुर सिंह के दो लड़के, दो बहू, दो पोती, तीन पोते इस आपदा में मारे गए। केवल दो विवाहिता पौत्रियां ही परिवार की निशानी के रूप में शेष रहीं। बहादुर सिंह और उनकी पत्नी मोतिमा देवी की जान उस रात झेकला स्थित दूसरे मकान में रहने की वजह से बची। हादसे से बहादुर सिंह की पत्नी मोतिमा देवी को भारी सदमा लगा और सात महीने बाद उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन बहादुर सिंह ने हिम्मत और हौसले को बनाए रखा।
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शुक्रवार को यह बुजुर्ग घर से एक किमी दूर घास काटते मिले। अब एक गाय और एक बछिया ही उनके साथी, संगी हैं। बताया कि उन्हीं के लिए घास संग्रह कर रहे हैं। पूजापाठ और पशुपालन, खेती में दिन निकालने वाले बुजुर्ग कहते हैं कि होनी को कोई नहीं टाल सकता। कहते हैं कि आपदा में सबको खोने के बाद वह अपना नया जीवन जी रहे हैं। उन्हें किसी से कोई शिकवा-शिकायत नहीं है। ग्राम प्रधान धन सिंह राणा कहते हैं कि बुजुर्ग अपना सारा काम खुद करते हैं। उनमें जीने की गजब की ललक है।
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पोतियों के काम आ रहा बुढ़ापा
बुजुर्ग बहादुर सिंह के लड़के बलवंत सिंह की बेटी चंपा (30) क्वीटी तो गंगा (32) होकरा में ब्याही हैं। दोनों उनकी देखरेख के लिए झेकला आती रहती हैं।

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