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स्टील के प्रचलन से लोहे के बर्तनों का क्रेज कम हुआ

Mon, 17 Apr 2017 10:56 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़।
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़। Updated Mon, 17 Apr 2017 10:56 PM IST
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Iron Pellets Due to the Prevalence of Steel
थल मेले में लोहे के बर्तनों की एक दुकान। - फोटो : अमर उजाला

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थल मेले में लोहे के बर्तनों को लेकर आने वाले कारीगर मायूस हैं। पहले मेले में लोहे के बर्तनों की दस दुकानें लगती थी जो अब सिमटकर तीन में पहुंच गई है। जितनी सामग्री यह लोग लेकर आते हैं उसको बेचने में उनको भारी मशक्कत करनी पड़ती है। पांच दिन से थल मेले में लोहे के बर्तनों को लेकर पहुंचे कारीगरों ने बताया कि पांच दिन में सिर्फ 50 फीसदी सामान ही बिका है। अब खरीददारों की संख्या कम होने लगी है। ऐसे में सामग्री को वापस ले जाना पड़ेगा। स्टील से बने बर्तनों का प्रचलन बढ़ जाने से लोग लोहे के बर्तन कम खरीदते हैं।
चंपावत जिले के कमलेख गांव निवासी लक्ष्मण कुमार, चंचल कुमार और राजेश कुमार तीन भाइयों ने यहां पर लोहे के बर्तनों की दुकान लगा रखी है। उन्होंने बताया कि वह आठ क्विंटल सामान लेकर आए थे। अब तक चार क्विंटल सामान बिक पाया है। उनके पास लोहे की कढ़ाई, दरांती, तवा जैसी सामग्री है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज थल मेले में वर्षों से लोहे के बर्तन लेकर आते थे। जितना सामान नहीं बिका उसे गांवों में फेरी लगाकर बेचते थे। नई पीढ़ी के लोग गांवों में फेरी लगाना पसंद नहीं करते। इसी तरह कमलेख गांव के ही महेश कुमार भी दस क्विंटल सामग्री लेकर आए हैं। उनका भी पांच क्विंटल सामान ही बिक पाया है।
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लोहे के बर्तन तैयार करना इनका परंपरागत पेशा है। कच्चा माल कानपुर और धामपुर से लाकर उसके बर्तन घर पर ही तैयार करते हैं। बड़ी कढ़ाई को तैयार करने में कम से कम पांच दिन का समय लगता है। उन्होंने बताया कि गांवों के कुछ पुराने लोग ही अब लोहे के बर्तन खरीदते हैं। नई पीढ़ी ने घर के उपयोग के लिए नए किस्म के बर्तन रख लिए हैं। 
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रेशे से बने कुथले अब गायब
थल। भांग के रेशे से तैयार किए गए कुथले (थैले) अब गायब हो गए हैं। सरकार ने भांग की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस कारण अब रेशा नहीं मिल पाता। पहले पहाड़ के गांवों में भांग के रेशे से तैयार कुथलों का खूब प्रयोग होता था। यह कुथले काफी टिकाऊ भी होते थे। अब इनकी जगह प्लास्टिक से बने थैलों ने ले ली है।
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