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कितनी सरकारें आई और गई, वनराजियों के दिन नहीं बहुरे

Fri, 02 Nov 2018 11:18 PM IST
दिनेश अवस्थी/अमर उजाला, पिथौरागढ़
दिनेश अवस्थी/अमर उजाला, पिथौरागढ़ Updated Fri, 02 Nov 2018 11:18 PM IST
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How many governments have come and gone, not on the days of monarchy
जौलजीबी में व्यथा सुनाती वनराजि महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

पहाड़ पर बसे वनराजि परिवार अब भी मूलभूत सुविधाओं से काफी दूर हैं। यहां की महिलाएं जंगलों से लकड़ियां बीनकर लाती हैं और उन्हें बेचकर परिवार की आजीविका चलाती हैं। इस समाज के बच्चे अब भी शिक्षा से महरूम हैं। आजादी के बाद से देश-प्रदेश में कितनी सरकारें आई और चली गई, लेकिन इस समाज के दिन नहीं बहुरे।

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धारचूला विकासखंड के किमखोला में वनराजियों का गांव है। इस गांव में करीब 115 मतदाता हैं। राज्य के पहले आम चुनाव के बाद इस समाज के गगन सिंह रजवार लगातार 10 साल तक विधायक रहे, इसके बावजूद वनराजि समाज के दिन नहीं बहुरे। यहां की महिलाएं अब भी जंगलों से लकड़ियां लाकर उन्हें बेचती हैं और जीवन यापन करती हैं। वनराजि समाज के लोग काफी सीधे हैं। उन्हें तो यह तक पता नहीं कि सरकार क्या होती है। वनराजि के बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने के लिए पूर्व विधायक हीरा सिंह बोरा ने वर्ष 2001 में जौलजीबी में राजि जनजाति आवासीय विद्यालय खोला था।
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तब इसमें सौ बच्चे पढ़ते थे। बाद में वर्ष 2016 में विद्यालय बंद हो गया। जब विद्यालय बंद हुआ, तब इसमें 60 बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। इनमें से वर्तमान में 15 बच्चे बलुवाकोट आश्रम पद्धति और 10 बच्चे किमखोला प्राइमरी स्कूल में पढ़ते हैं। 35 बच्चे अब भी घरों में बैठे हैं। आवासीय विद्यालय की आया फूना देवी ने बताया कि स्कूल बंद होने से बच्चे घर पर ही हैं।
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वनराजियों के उत्थान के लिए कार्य कर रही अर्पण संस्था की अध्यक्ष रेनू ठाकुर ने बताया कि हालांकि, पिछले वर्षों में समाज जागरूक हुआ है। महिलाएं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। बलुवाकोट क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता सुरेंद्र सिंह बिष्ट का कहना है कि अब भी वनराजि समाज आदिम युग में ही जीने को विवश हैं। इस समाज के बच्चों की पढ़ाई की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। साथ ही महिलाओं के उत्थान के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।

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