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पहाड़ों के प्रतीक हैं महेश्वर और वनस्पति की प्रतीक है गौरा
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सीमांत के सतगढ़ गांव में सांतू-आंठू पर्व को लेकर ढुल खेल लगाते ग्रामीण(फाइल)
- फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। कुमाऊं में मनाया जा रहा सातूं-आठूं उत्सव जगत जननी मां पार्वती और भगवान शिव की उपासना का लोक पर्व है। महिलाएं हिमालय पुत्री मां पार्वती की गमरा और भगवान शिव की महेश्वर के रूप में विग्रह बनाकर पूजा अर्चना करती हैं। सातूं-आठूं में धर्म और लोक संस्कृति की गहरी झलक दिखती है। गौरा को वनस्पति और महेश्वर को पहाड़ों का प्रतीक माना गया है।
साहित्यकार और लोक संस्कृति के जानकार पद्मा दत्त पंत बताते हैं कि प्राचीन मान्यता के अनुसार हिमालय पुत्री मां पार्वती को कुमाऊं के गांवों में महिलाएं भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को ससुराल हिमालय से अपने मायके आमंत्रित करते हैं। महिलाएं खेत में जाकर धान, सवां के पौधों से मां पार्वती के गमरा और भगवान शिव के महेश्वर के रूप में विग्रह बनाती हैं।
मान्यता के अनुसार गांव में बने एक मकान में लाकर दोनों को स्थापित किया जाता है। वैदिक मंत्रोंच्चारण के साथ महिलाएं दो से तीन दिन तक नियमित पूजा करतीं हैं। महिलाएं इस पर्व पर सप्तमी तिथि को पूजा, अर्चना के बाद अपने दाहिने हाथ में एक डोर ग्रहण करती हैं। अष्टमी के दिन पूजा, अर्चना के बाद गले में दुबधागा डोर पहना जाता है। मान्यता है कि इस उपवास में रहकर पूजा-अर्चना करने से अखंड सौभाग्य के मनोकामना पूरी होती हैं।
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चढ़ाए जाते हैं बिरूड़े और नींबू प्रजाति के फल
गमरा महेश्वर को बिरूड़े और नीबू प्रजाति के फल चढ़ाए जाते हैं। भाद्रपद मास की पंचमी को बिरूड़ पंचमी भी कहते हैं। इस दिन महिलाएं प्रात: स्नान के बाद पांच दालों को तांबे के बर्तन में भीगाने के लिए घर के मंदिर में रखती हैं। जिस बर्तन में इन दालों को रखा जाता है, उसके बाहर मंगल प्रतीक समझे जाने वाले गाय के गोबर के टिपके पर टीका, चंदन लगाकर हरी दूब के तिनके रोपे जाते हैं। सप्तमी को गांव की सभी महिलाएं सामूहिक तौर पर नौले, धारों में बिरुड़े धोती हैं।
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साहित्यकार और लोक संस्कृति के जानकार पद्मा दत्त पंत बताते हैं कि प्राचीन मान्यता के अनुसार हिमालय पुत्री मां पार्वती को कुमाऊं के गांवों में महिलाएं भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को ससुराल हिमालय से अपने मायके आमंत्रित करते हैं। महिलाएं खेत में जाकर धान, सवां के पौधों से मां पार्वती के गमरा और भगवान शिव के महेश्वर के रूप में विग्रह बनाती हैं।
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मान्यता के अनुसार गांव में बने एक मकान में लाकर दोनों को स्थापित किया जाता है। वैदिक मंत्रोंच्चारण के साथ महिलाएं दो से तीन दिन तक नियमित पूजा करतीं हैं। महिलाएं इस पर्व पर सप्तमी तिथि को पूजा, अर्चना के बाद अपने दाहिने हाथ में एक डोर ग्रहण करती हैं। अष्टमी के दिन पूजा, अर्चना के बाद गले में दुबधागा डोर पहना जाता है। मान्यता है कि इस उपवास में रहकर पूजा-अर्चना करने से अखंड सौभाग्य के मनोकामना पूरी होती हैं।
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चढ़ाए जाते हैं बिरूड़े और नींबू प्रजाति के फल
गमरा महेश्वर को बिरूड़े और नीबू प्रजाति के फल चढ़ाए जाते हैं। भाद्रपद मास की पंचमी को बिरूड़ पंचमी भी कहते हैं। इस दिन महिलाएं प्रात: स्नान के बाद पांच दालों को तांबे के बर्तन में भीगाने के लिए घर के मंदिर में रखती हैं। जिस बर्तन में इन दालों को रखा जाता है, उसके बाहर मंगल प्रतीक समझे जाने वाले गाय के गोबर के टिपके पर टीका, चंदन लगाकर हरी दूब के तिनके रोपे जाते हैं। सप्तमी को गांव की सभी महिलाएं सामूहिक तौर पर नौले, धारों में बिरुड़े धोती हैं।