फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Pithoragarh News ›   Farra is considered a symbol of bravery, tradition and reverence towards Mother Varahi

Pithoragarh News: वीरता, परंपरा और मां वाराही के प्रति श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है फर्रा

Mon, 24 Aug 2026 11:13 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़ Updated Mon, 24 Aug 2026 11:13 PM IST
विज्ञापन
Farra is considered a symbol of bravery, tradition and reverence towards Mother Varahi
पाटी (चंपावत)। मां वाराही धाम देवीधुरा में प्राचीन काल से रक्षाबंधन बंधन पर्व के दिन बगवाल का भी अहम हिस्सा फर्रा है। बगवाल के दिन बगवाली वीर रिंगाल (बांस) से बनने वाले फर्रे पकड़कर अपना बचाव करते हैं। फर्रा पकड़ने की यह परंपरा सदियों से धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक मान्यता से जुड़ी है।
विज्ञापन

मान्यता के अनुसार, बगवाल के दौरान चारों खाम सात थोक के बगवाली वीर मां वाराही के जयकारों के साथ बगवाल खेलने के लिए हाथ में फर्रे यानी ढाल लेकर फल-फूल और पत्थरों की बौछार से स्वयं को बचाने के लिए फर्रों का उपयोग करते हैं। फर्रा वीरता, शक्ति और मां वाराही के संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।
विज्ञापन

गहड़वाल खाम के बगवाली वीर राजेश बिष्ट का कहना है कि प्राचीन काल में नरबलि की प्रथा रुकने के बाद उसके स्थान पर पत्थरों से बगवाल खेलने की परंपरा शुरू हुई। उस दौरान योद्धाओं ने पत्थरों से बचाव के लिए फर्रों का इस्तेमाल किया गया जो बाद में बगवाल की प्रमुख परंपरा बन गया। आज भी बगवाली वीर फर्रे को मां वाराही के चरणों में अर्पित करने के बाद बगवाल खेलने में इसका उपयोग करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

चारों खामों के बगवाली वीर जब फर्रे लेकर खोलीखांण दुबाचौड़ मैदान में उतरते हैं तो यह दृश्य वीरता, परंपरा और मां वाराही के प्रति श्रद्धा का प्रतीक बन जाता है। प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा आज भी देवीधुरा बगवाल की विशिष्ट पहचान है।

-----

फर्रे आस्था के साथ ही रोजगार का भी स्रोत
देवीधुरा के कटना और सूनी गांव के शिल्पकारों के लिए बगवाल मेला आस्था के साथ ही रोजगार का भी स्रोत है। बिशन राम, कैलाश राम, दीवान राम, प्रकाश राम आदि शिल्पकारों ने बताया कि वे गांव के जंगलों में चार से पांच किमी दूर से रिंगाल (बांस) लाकर उससे फर्रे तैयार किए जाते हैं। एक फर्रे को बनाने में 10 से 12 दिन का समय लगता है। गांव के लोग सदियों से बगवाल मेले के लिए मांग के अनुरूप फर्रे बनाते हैं। एक फर्रे की कीमत 2500 रुपये से लेकर पांच हजार रुपये तक होती है। बगवाल वीरों की मांग के अनुसार सैकड़ों फर्रों का निर्माण किया जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed